हित्वा दैत्यरिपोरुरः स्वभवनं शून्यत्वदोषस्फुटा-
सीदन्मर्कटकीटकृत्रिमसितच्छत्त्रीभवत्कौस्तुभम् ।
उज्झित्वा निजसद्म पद्ममपि तद्व्यक्तावनद्धीकृतं
लूतातन्तुभिरन्तरद्य भुजयोः श्रीरस्य विश्राम्यति ॥
हित्वा दैत्यरिपोरुरः स्वभवनं शून्यत्वदोषस्फुटा-
सीदन्मर्कटकीटकृत्रिमसितच्छत्त्रीभवत्कौस्तुभम् ।
उज्झित्वा निजसद्म पद्ममपि तद्व्यक्तावनद्धीकृतं
लूतातन्तुभिरन्तरद्य भुजयोः श्रीरस्य विश्राम्यति ॥
सीदन्मर्कटकीटकृत्रिमसितच्छत्त्रीभवत्कौस्तुभम् ।
उज्झित्वा निजसद्म पद्ममपि तद्व्यक्तावनद्धीकृतं
लूतातन्तुभिरन्तरद्य भुजयोः श्रीरस्य विश्राम्यति ॥
अन्वयः
AI
श्रीः अद्य, शून्यत्वदोषस्फुटासीदन्मर्कटकीटकृत्रिमसितच्छत्त्रीभवत्कौस्तुभम् स्वभवनम् दैत्यरिपोः उरः हित्वा, लूतातन्तुभिः व्यक्तावनद्धीकृतम् तत् निजसद्म पद्मम् अपि उज्झित्वा, अस्य भुजयोः अन्तः विश्राम्यति।
Summary
AI
Today, the goddess Shri (Lakshmi), having abandoned her own abode—the chest of Vishnu, where the Kaustubha gem was becoming a white umbrella of cobwebs for spiders due to its emptiness—and also having left her other home, the lotus, now clearly covered with spider threads, rests between the arms of this king.
पदच्छेदः
AI
| हित्वा | हित्वा (√हा+क्त्वा) | Having abandoned |
| दैत्यरिपोः | दैत्यरिपु (६.१) | of Vishnu |
| उरः | उरस् (२.१) | the chest |
| स्वभवनम् | स्वभवन (२.१) | her own abode |
| शून्यत्वदोषस्फुटासीदन्मर्कटकीटकृत्रिमसितच्छत्त्रीभवत्कौस्तुभम् | शून्यत्व–दोष–स्फुट–आसीदत्–मर्कट–कीट–कृत्रिम–सित–छत्त्रीभवत्–कौस्तुभ (२.१) | where the Kaustubha gem was clearly becoming an artificial white umbrella of cobwebs for spiders due to emptiness |
| उज्झित्वा | उज्झित्वा (√उझ्झ्+क्त्वा) | having left |
| निजसद्म | निजसद्मन् (२.१) | her own home |
| पद्मम् | पद्म (२.१) | the lotus |
| अपि | अपि | also |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| व्यक्तावनद्धीकृतम् | व्यक्त–अवनद्धीकृत (२.१) | clearly covered |
| लूतातन्तुभिः | लूतातन्तु (३.३) | by spider threads |
| अन्तः | अन्तः | between |
| अद्य | अद्य | today |
| भुजयोः | भुज (७.२) | the two arms |
| श्रीः | श्री (१.१) | Shri (Lakshmi) |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this one |
| विश्राम्यति | विश्राम्यति (वि√श्रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rests |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हि | त्वा | दै | त्य | रि | पो | रु | रः | स्व | भ | व | नं | शू | न्य | त्व | दो | ष | स्फु | टा |
| सी | द | न्म | र्क | ट | की | ट | कृ | त्रि | म | सि | त | च्छ | त्त्री | भ | व | त्कौ | स्तु | भम् |
| उ | ज्झि | त्वा | नि | ज | स | द्म | प | द्म | म | पि | त | द्व्य | क्ता | व | न | द्धी | कृ | तं |
| लू | ता | त | न्तु | भि | र | न्त | र | द्य | भु | ज | योः | श्री | र | स्य | वि | श्रा | म्य | ति |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.