सिन्दूरद्युतिमुग्धमूर्धनि धृतस्कन्धावध्रिश्यामिके
व्योमान्तस्पृशि सिन्धुरेऽस्य समरारम्भोद्धुरे धावति ।
जानीमो नु यदि प्रदोषतिमिरव्यामिश्रसंध्याधिये-
वास्तं यान्ति समस्तबाहुजभुजातेजःसहस्रांशवः ॥
सिन्दूरद्युतिमुग्धमूर्धनि धृतस्कन्धावध्रिश्यामिके
व्योमान्तस्पृशि सिन्धुरेऽस्य समरारम्भोद्धुरे धावति ।
जानीमो नु यदि प्रदोषतिमिरव्यामिश्रसंध्याधिये-
वास्तं यान्ति समस्तबाहुजभुजातेजःसहस्रांशवः ॥
व्योमान्तस्पृशि सिन्धुरेऽस्य समरारम्भोद्धुरे धावति ।
जानीमो नु यदि प्रदोषतिमिरव्यामिश्रसंध्याधिये-
वास्तं यान्ति समस्तबाहुजभुजातेजःसहस्रांशवः ॥
अन्वयः
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अस्य समरारम्भोद्धुरे, सिन्दूरद्युतिमुग्धमूर्धनि, धृतस्कन्धावध्रिश्यामिके, व्योमान्तस्पृशि सिन्धुरे धावति (सति), समस्तबाहुजभुजातेजःसहस्रांशवः प्रदोषतिमिरव्यामिश्रसंध्याधिया इव अस्तम् यान्ति इति नु जानीमः।
Summary
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When this king's elephant—eager for battle, its charming head glowing with vermilion, bearing the dark mark of a rubbing cloth on its shoulder, and seeming to touch the sky—charges, we think that the suns, which are the splendor of the arms of all other warriors, set as if under the mistaken impression that it is twilight mixed with the darkness of evening.
पदच्छेदः
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| सिन्दूरद्युतिमुग्धमूर्धनि | सिन्दूर–द्युति–मुग्ध–मूर्धन् (७.१) | on whose charming head is the glow of vermilion |
| धृतस्कन्धावध्रिश्यामिके | धृत–स्कन्ध–अवध्रि–श्यामिका (७.१) | on which the dark mark of the rubbing cloth is held on the shoulder |
| व्योमान्तस्पृशि | व्योमन्–अन्त–स्पृश् (७.१) | touching the end of the sky |
| सिन्धुरे | सिन्धुर (७.१) | on the elephant |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| समरारम्भोद्धुरे | समर–आरम्भ–उद्धुर (७.१) | eager for the start of battle |
| धावति | धावत् (√धाव्+शतृ, ७.१) | while running |
| जानीमः | जानीमः (√ज्ञा कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we think |
| नु | नु | surely |
| यत् | यद् | that |
| प्रदोषतिमिरव्यामिश्रसंध्याधिया | प्रदोष–तिमिर–व्यामिश्र–संध्या–धी (३.१) | with the impression of an evening twilight mixed with darkness |
| इव | इव | as if |
| अस्तम् | अस्तम् | set |
| यान्ति | यान्ति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | go |
| समस्तबाहुजभुजातेजःसहस्रांशवः | समस्त–बाहुज–भुजा–तेजस्–सहस्रांशु (१.३) | the suns which are the splendor of the arms of all warriors |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सि | न्दू | र | द्यु | ति | मु | ग्ध | मू | र्ध | नि | धृ | त | स्क | न्धा | व | ध्रि | श्या | मि | के |
| व्यो | मा | न्त | स्पृ | शि | सि | न्धु | रे | ऽस्य | स | म | रा | र | म्भो | द्धु | रे | धा | व | ति |
| जा | नी | मो | नु | य | दि | प्र | दो | ष | ति | मि | र | व्या | मि | श्र | सं | ध्या | धि | ये |
| वा | स्तं | या | न्ति | स | म | स्त | बा | हु | ज | भु | जा | ते | जः | स | ह | स्रां | श | वः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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