विद्राणे रणचत्वरादरिगणे त्रस्ते समस्ते पुनः
कोपात्कोऽपि निवर्तते यदि भटः कीर्त्या जगत्युद्भटः ।
आगच्छन्नपि संमुखं विमुखतामेवाधिगच्छत्यसौ
द्रागेतच्छुरिकारयेण ठणिति च्छिन्नापसर्पच्छिराः ॥
विद्राणे रणचत्वरादरिगणे त्रस्ते समस्ते पुनः
कोपात्कोऽपि निवर्तते यदि भटः कीर्त्या जगत्युद्भटः ।
आगच्छन्नपि संमुखं विमुखतामेवाधिगच्छत्यसौ
द्रागेतच्छुरिकारयेण ठणिति च्छिन्नापसर्पच्छिराः ॥
कोपात्कोऽपि निवर्तते यदि भटः कीर्त्या जगत्युद्भटः ।
आगच्छन्नपि संमुखं विमुखतामेवाधिगच्छत्यसौ
द्रागेतच्छुरिकारयेण ठणिति च्छिन्नापसर्पच्छिराः ॥
अन्वयः
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रण-चत्वरात् समस्ते अरि-गणे विद्राणे त्रस्ते (सति), यदि कोपात् कः अपि कीर्त्या जगति उद्भटः भटः पुनः निवर्तते, असौ संमुखम् आगच्छन् अपि द्राक् एतत्-छुरिका-रयेण ठणिति छिन्न-अपसर्पत्-शिराः (सन्) विमुखताम् एव अधिगच्छति।
Summary
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When the entire host of enemies has fled in terror from the battlefield, if some renowned warrior turns back out of anger, that warrior, even while approaching face-to-face, quickly turns away. This is because his head, severed with a "thwang" by the speed of this king's dagger, flies off.
पदच्छेदः
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| विद्राणे | विद्राण (वि√द्रा+क्त, ७.१) | having fled |
| रणचत्वरात् | रण-चत्वर (५.१) | from the battlefield |
| अरिगणे | अरि-गण (७.१) | the host of enemies |
| त्रस्ते | त्रस्त (√त्रस्+क्त, ७.१) | being terrified |
| समस्ते | समस्त (७.१) | entire |
| पुनः | पुनः | again |
| कोपात् | कोप (५.१) | out of anger |
| कोऽपि | किम् (१.१)–अपि | some |
| निवर्तते | निवर्तते (नि√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | turns back |
| यदि | यदि | if |
| भटः | भट (१.१) | warrior |
| कीर्त्या | कीर्ति (३.१) | by fame |
| जगति | जगत् (७.१) | in the world |
| उद्भटः | उद्भट (१.१) | renowned |
| आगच्छन्नपि | आगच्छत् (आ√गम्+शतृ, १.१)–अपि | even while approaching |
| संमुखं | संमुखम् | face-to-face |
| विमुखतामेवाधिगच्छत्यसौ | विमुखता (२.१)–एव–अधिगच्छति (अधि√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.)–अदस् (१.१) | he attains the state of turning away |
| द्रागेतच्छुरिकारयेण | द्राक्–एतत्-छुरिका-रय (३.१) | quickly by the speed of this one's dagger |
| ठणिति | ठणिति | with a 'thwang' sound |
| छिन्नापसर्पच्छिराः | छिन्न (√छिद्+क्त)–अपसर्पत् (अप√सृप्+शतृ)–शिरस् (१.१) | one whose head is severed and flying away |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | द्रा | णे | र | ण | च | त्व | रा | द | रि | ग | णे | त्र | स्ते | स | म | स्ते | पु | नः |
| को | पा | त्को | ऽपि | नि | व | र्त | ते | य | दि | भ | टः | की | र्त्या | ज | ग | त्यु | द्भ | टः |
| आ | ग | च्छ | न्न | पि | सं | मु | खं | वि | मु | ख | ता | मे | वा | धि | ग | च्छ | त्य | सौ |
| द्रा | गे | त | च्छु | रि | का | र | ये | ण | ठ | णि | ति | च्छि | न्ना | प | स | र्प | च्छि | राः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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