अस्मिन्दिग्विजयोद्यते पतिरयं मे स्यादिति ध्यायिनी
कम्पं सात्त्विकभावमञ्चति रिपुक्षोणीन्द्रदारा धरा ।
अस्यैवाभिमुखं निपत्य समरे यास्यद्भिरूर्ध्वं निजः
पन्था भास्वति दृश्यते बिलमयः प्रत्यर्थिभिः पार्थिवैः ॥
अस्मिन्दिग्विजयोद्यते पतिरयं मे स्यादिति ध्यायिनी
कम्पं सात्त्विकभावमञ्चति रिपुक्षोणीन्द्रदारा धरा ।
अस्यैवाभिमुखं निपत्य समरे यास्यद्भिरूर्ध्वं निजः
पन्था भास्वति दृश्यते बिलमयः प्रत्यर्थिभिः पार्थिवैः ॥
कम्पं सात्त्विकभावमञ्चति रिपुक्षोणीन्द्रदारा धरा ।
अस्यैवाभिमुखं निपत्य समरे यास्यद्भिरूर्ध्वं निजः
पन्था भास्वति दृश्यते बिलमयः प्रत्यर्थिभिः पार्थिवैः ॥
अन्वयः
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अस्मिन् दिग्विजय-उद्यते, "अयम् मे पतिः स्यात्" इति ध्यायिनी रिपु-क्षोणीन्द्र-दारा धरा सात्त्विक-भावम् कम्पम् अञ्चति। समरे अस्य अभिमुखम् एव निपत्य ऊर्ध्वम् यास्यद्भिः प्रत्यर्थिभिः पार्थिवैः निजः पन्थाः भास्वति बिल-मयः दृश्यते।
Summary
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When this king sets out for world conquest, the Earth, wife of enemy kings, trembles with the involuntary emotion of love, thinking, "May he be my husband." The enemy kings, who will fall before him in battle and ascend to heaven, see their own path upwards through the sun's orb as a tunnel.
पदच्छेदः
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| अस्मिन् | इदम् (७.१) | when this one |
| दिग्विजयोद्यते | दिग्विजय-उद्यत (७.१) | is engaged in world conquest |
| पतिः | पति (१.१) | husband |
| अयं | इदम् (१.१) | this one |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may be |
| इति | इति | thus |
| ध्यायिनी | ध्यायिनी (१.१) | thinking |
| कम्पं | कम्प (२.१) | trembling |
| सात्त्विकभावम् | सात्त्विक-भाव (२.१) | an involuntary emotion |
| अञ्चति | अञ्चति (√अञ्च् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | experiences |
| रिपुक्षोणीन्द्रदारा | रिपु-क्षोणीन्द्र-दारा (१.१) | the wife of enemy kings |
| धरा | धरा (१.१) | the Earth |
| अस्यैवाभिमुखं | इदम् (६.१)–एव–अभिमुखम् | right in front of him |
| निपत्य | निपत्य (नि√पत्+ल्यप्) | having fallen |
| समरे | समर (७.१) | in battle |
| यास्यद्भिः | यास्यत् (√या+स्य+शतृ, ३.३) | by those who will go |
| ऊर्ध्वं | ऊर्ध्वम् | upwards |
| निजः | निज (१.१) | their own |
| पन्था | पथिन् (१.१) | path |
| भास्वति | भास्वत् (७.१) | in the sun |
| दृश्यते | दृश्यते (√दृश् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is seen |
| बिलमयः | बिल-मय (१.१) | as a tunnel |
| प्रत्यर्थिभिः | प्रत्यर्थिन् (३.३) | by the enemy |
| पार्थिवैः | पार्थिव (३.३) | kings |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्मि | न्दि | ग्वि | ज | यो | द्य | ते | प | ति | र | यं | मे | स्या | दि | ति | ध्या | यि | नी |
| क | म्पं | सा | त्त्वि | क | भा | व | म | ञ्च | ति | रि | पु | क्षो | णी | न्द्र | दा | रा | ध | रा |
| अ | स्यै | वा | भि | मु | खं | नि | प | त्य | स | म | रे | या | स्य | द्भि | रू | र्ध्वं | नि | जः |
| प | न्था | भा | स्व | ति | दृ | श्य | ते | बि | ल | म | यः | प्र | त्य | र्थि | भिः | पा | र्थि | वैः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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