ततस्तदुर्वीन्द्रगुणाद्भुतादिव
स्ववक्त्रपद्मेऽङ्गुलिनालदायिनी ।
विधीयतामाननमुद्रणेति सा
जगाद वैदग्ध्यमयेङ्गितैव ताम् ॥
ततस्तदुर्वीन्द्रगुणाद्भुतादिव
स्ववक्त्रपद्मेऽङ्गुलिनालदायिनी ।
विधीयतामाननमुद्रणेति सा
जगाद वैदग्ध्यमयेङ्गितैव ताम् ॥
स्ववक्त्रपद्मेऽङ्गुलिनालदायिनी ।
विधीयतामाननमुद्रणेति सा
जगाद वैदग्ध्यमयेङ्गितैव ताम् ॥
अन्वयः
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ततः सा तत्-उर्वीन्द्र-गुण-अद्भुतात् इव स्व-वक्त्र-पद्मे अङ्गुलि-नाल-दायिनी (सती), "आनन-मुद्रणा विधीयताम्" इति वैदग्ध्य-मय-इङ्गितैः एव ताम् जगाद।
Summary
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Then Damayanti, as if from wonder at that king's virtues, placed her finger-stalk on her lotus-face. With this clever gesture, she told Saraswati, as if to say, "Let my face be sealed (i.e., let there be silence)," indicating her disapproval.
पदच्छेदः
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| ततः | ततः | then |
| तदुर्वीन्द्रगुणाद्भुतादिव | तद्-उर्वीन्द्र-गुण-अद्भुत (५.१)–इव | as if from wonder at that king's virtues |
| स्ववक्त्रपद्मेऽङ्गुलिनालदायिनी | स्व-वक्त्र-पद्म (७.१)–अङ्गुलि-नाल-दायिनी (१.१) | she who was placing her finger-stalk on her lotus-face |
| विधीयतामाननमुद्रणेति | विधीयताम् (वि√धा भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.)–आनन-मुद्रणा (१.१)–इति | 'let the sealing of the face be done' |
| सा | तद् (१.१) | she (Damayanti) |
| जगाद | जगाद (√गद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | told |
| वैदग्ध्यमयेङ्गितैव | वैदग्ध्य-मय-इङ्गित (३.३)–एव | only with clever gestures |
| ताम् | तद् (२.१) | her (Saraswati) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्त | दु | र्वी | न्द्र | गु | णा | द्भु | ता | दि | व |
| स्व | व | क्त्र | प | द्मे | ऽङ्गु | लि | ना | ल | दा | यि | नी |
| वि | धी | य | ता | मा | न | न | मु | द्र | णे | ति | सा |
| ज | गा | द | वै | द | ग्ध्य | म | ये | ङ्गि | तै | व | ताम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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