एतद्भीतारिनारी गिरिबिलविगलद्वासरा निःसरन्ती
स्वक्रीडाहंसमोहग्रहिलशिशुभृशप्रार्थितोन्निद्रचन्द्रा ।
आक्रन्दद्भूरि यत्तन्नयनजलमिलच्चन्द्रहंसानुबिम्ब-
प्रत्यासत्तिप्रहृष्यत्तनयविहसितैराश्वसीन्न्यश्वसीच्च ॥
एतद्भीतारिनारी गिरिबिलविगलद्वासरा निःसरन्ती
स्वक्रीडाहंसमोहग्रहिलशिशुभृशप्रार्थितोन्निद्रचन्द्रा ।
आक्रन्दद्भूरि यत्तन्नयनजलमिलच्चन्द्रहंसानुबिम्ब-
प्रत्यासत्तिप्रहृष्यत्तनयविहसितैराश्वसीन्न्यश्वसीच्च ॥
स्वक्रीडाहंसमोहग्रहिलशिशुभृशप्रार्थितोन्निद्रचन्द्रा ।
आक्रन्दद्भूरि यत्तन्नयनजलमिलच्चन्द्रहंसानुबिम्ब-
प्रत्यासत्तिप्रहृष्यत्तनयविहसितैराश्वसीन्न्यश्वसीच्च ॥
अन्वयः
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एतत्-भीत-अरि-नारी गिरि-बिल-विगलत्-वासरा निःसरन्ती, स्व-क्रीडा-हंस-मोह-ग्रहिल-शिशु-भृश-प्रार्थित-उन्निद्र-चन्द्रा (सती), भूरि आक्रन्दत्। यत् तत्-नयन-जल-मिलत्-चन्द्र-हंस-अनुबिम्ब-प्रत्यासत्ति-प्रहृष्यत्-तनय-विहसितैः आश्वसीत् न्यश्वसीत् च।
Summary
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The wife of an enemy, terrified by this king, emerged from a mountain cave. Her child, mistaking the full moon for its pet swan, insistently begged for it, causing her to weep profusely. Yet, she was consoled and sighed in relief by the laughter of her son, who rejoiced at the proximity of the moon's reflection in her tears, thinking it was his swan.
पदच्छेदः
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| एतद्भीतारिनारी | एतत्-भीत-अरि-नारी (१.१) | the wife of an enemy terrified by this one |
| गिरिबिलविगलद्वासरा | गिरि–बिल–विगलत् (वि√गल्+शतृ)–वासर (१.१) | she whose days were slipping away in a mountain cave |
| निःसरन्ती | निःसरन्ती (निस्√सृ+शतृ, १.१) | emerging |
| स्वक्रीडाहंसमोहग्रहिलशिशुभृशप्रार्थितोन्निद्रचन्द्रा | स्व–क्रीडा–हंस–मोह–ग्रहिल–शिशु–भृश–प्रार्थित (प्र√प्रार्थ्+क्त)–उन्निद्र–चन्द्र (१.१) | she for whom the full moon was greatly requested by her insistent child, deluded that it was its pet swan |
| आक्रन्दत् | आक्रन्दत् (आ√क्रन्द् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | wept |
| भूरि | भूरि | profusely |
| यत्तन्नयनजलमिलच्चन्द्रहंसानुबिम्बप्रत्यासत्तिप्रहृष्यत्तनयविहसितैः | यत्–तद्–नयनजल–मिलत् (√मिल्+शतृ)–चन्द्रहंस–अनुबिम्ब–प्रत्यासत्ति–प्रहृष्यत् (प्र√हृष्+शतृ)–तनय–विहसित (वि√हस्+क्त, ३.३) | because by the laughter of her son, who was rejoicing at the proximity of the reflection of the moon-swan in her tears |
| आश्वसीत् | आश्वसीत् (आ√श्वस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was consoled |
| न्यश्वसीच्च | न्यश्वसीत् (नि√श्वस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.)–च | and sighed |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | द्भी | ता | रि | ना | री | गि | रि | बि | ल | वि | ग | ल | द्वा | स | रा | निः | स | र | न्ती |
| स्व | क्री | डा | हं | स | मो | ह | ग्र | हि | ल | शि | शु | भृ | श | प्रा | र्थि | तो | न्नि | द्र | च | न्द्रा |
| आ | क्र | न्द | द्भू | रि | य | त्त | न्न | य | न | ज | ल | मि | ल | च्च | न्द्र | हं | सा | नु | बि | म्ब |
| प्र | त्या | स | त्ति | प्र | हृ | ष्य | त्त | न | य | वि | ह | सि | तै | रा | श्व | सी | न्न्य | श्व | सी | च्च |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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