इतोऽपि किं वीरयसे न कुर्वतो
नृपान्धनुर्बाणगुणैर्वशंवदान् ।
गुणेन शुद्धेन विधाय निर्भरं
तमेनमुर्वीवलयोर्वशी वशम् ॥
इतोऽपि किं वीरयसे न कुर्वतो
नृपान्धनुर्बाणगुणैर्वशंवदान् ।
गुणेन शुद्धेन विधाय निर्भरं
तमेनमुर्वीवलयोर्वशी वशम् ॥
नृपान्धनुर्बाणगुणैर्वशंवदान् ।
गुणेन शुद्धेन विधाय निर्भरं
तमेनमुर्वीवलयोर्वशी वशम् ॥
अन्वयः
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धनुः-बाण-गुणैः नृपान् वशंवदान् कुर्वतः (अस्य विषये) इतः अपि किम् न वीरयसे? उर्वी-वलय-उर्वशी तम् एनम् शुद्धेन गुणेन निर्भरम् वशम् विधाय (तिष्ठति)।
Summary
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"Why do you not extol his heroism even more, who makes other kings obedient with his bow, arrow, and string? The Urvashi of the earth-circle (i.e., royal fortune), having completely subdued him with her pure virtue alone, holds him in her sway."
पदच्छेदः
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| इतोऽपि | इतः–अपि | even more than this |
| किं | किम् | why |
| वीरयसे | वीरयसे (√वीरय कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | do you extol the heroism |
| न | न | not |
| कुर्वतः | कुर्वत् (√कृ+शतृ, ६.१) | of the one who makes |
| नृपान् | नृप (२.३) | kings |
| धनुर्बाणगुणैः | धनुस्-बाण-गुण (३.३) | with bow, arrow, and string |
| वशंवदान् | वशंवद (२.३) | obedient |
| गुणेन | गुण (३.१) | by virtue |
| शुद्धेन | शुद्ध (३.१) | pure |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having made |
| निर्भरं | निर्भरम् | completely |
| तमेनम् | तद् (२.१)–एनद् (२.१) | him, this one |
| उर्वीवलयोर्वशी | उर्वी-वलय-उर्वशी (१.१) | the Urvashi of the earth-circle (Fortune) |
| वशम् | वश (२.१) | subdued |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | तो | ऽपि | किं | वी | र | य | से | न | कु | र्व | तो |
| नृ | पा | न्ध | नु | र्बा | ण | गु | णै | र्व | शं | व | दान् |
| गु | णे | न | शु | द्धे | न | वि | धा | य | नि | र्भ | रं |
| त | मे | न | मु | र्वी | व | ल | यो | र्व | शी | व | शम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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