अयं किलायात् इतीरिपौरवा-
ग्भयादयादस्य रिपुर्वृथा वनम् ।
श्रुताष्तदुत्स्वापगिरस्तदक्षाराः
पठद्भिरत्रासि शुकैर्वनेऽपि सः ॥
अयं किलायात् इतीरिपौरवा-
ग्भयादयादस्य रिपुर्वृथा वनम् ।
श्रुताष्तदुत्स्वापगिरस्तदक्षाराः
पठद्भिरत्रासि शुकैर्वनेऽपि सः ॥
ग्भयादयादस्य रिपुर्वृथा वनम् ।
श्रुताष्तदुत्स्वापगिरस्तदक्षाराः
पठद्भिरत्रासि शुकैर्वनेऽपि सः ॥
अन्वयः
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"अयम् किल आयात्" इति ईरि-पौर-वाक्-भयात् अस्य रिपुः वृथा वनम् अयात्। सः वने अपि तत्-उत्स्वाप-गिरः तत्-अक्षराः श्रुताः शुकैः पठद्भिः अत्रासि।
Summary
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Out of fear from the words of the city-dwellers who announced, "He is indeed coming!", this king's enemy fled to the forest in vain. Even in the forest, he was terrified by the parrots who, having heard his sleep-talking, were reciting the very same words.
पदच्छेदः
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| अयं | इदम् (१.१) | he |
| किलायात् | किल–आयात् (आ√या कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | indeed came |
| इतीरिपौरवाग्भयात् | इति-ईरि-पौर-वाच्-भय (५.१) | from fear of the words of the city-dwellers who announced |
| अयात् | अयात् (√इ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| रिपुः | रिपु (१.१) | enemy |
| वृथा | वृथा | in vain |
| वनम् | वन (२.१) | to the forest |
| श्रुताष्तदुत्स्वापगिरस्तदक्षाराः | श्रुत (√श्रु+क्त, १.३)–तत्-उत्स्वाप-गिर् (१.३)–तत्-अक्षर (१.३) | having heard his sleep-talking words with those very syllables |
| पठद्भिः | पठत् (√पठ्+शतृ, ३.३) | by the reciting |
| अत्रासि | अत्रासि (√त्रस् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was terrified |
| शुकैः | शुक (३.३) | by parrots |
| वनेऽपि | वन (७.१)–अपि | even in the forest |
| सः | तद् (१.१) | he |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यं | कि | ला | या | ति | ती | रि | पौ | र | वा | |
| ग्भ | या | द | या | द | स्य | रि | पु | र्वृ | था | व | नम् |
| श्रु | ता | ष्त | दु | त्स्वा | प | गि | र | स्त | द | क्षा | राः |
| प | ठ | द्भि | र | त्रा | सि | शु | कै | र्व | ने | ऽपि | सः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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