इतो भिया भूपतिभिर्वनं वना-
दटद्भिरुच्चैरटवीत्वमीयुषी ।
निजापि सावापि चिरात्पुनः पुरी
पुनः स्वमध्यासि विलासमन्दिरम् ॥
इतो भिया भूपतिभिर्वनं वना-
दटद्भिरुच्चैरटवीत्वमीयुषी ।
निजापि सावापि चिरात्पुनः पुरी
पुनः स्वमध्यासि विलासमन्दिरम् ॥
दटद्भिरुच्चैरटवीत्वमीयुषी ।
निजापि सावापि चिरात्पुनः पुरी
पुनः स्वमध्यासि विलासमन्दिरम् ॥
अन्वयः
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इतः भिया वनात् वनम् अटद्भिः भूपतिभिः उच्चैः अटवीत्वम् ईयुषी सा निजा पुरी अपि चिरात् पुनः अवापि, पुनः स्वम् विलास-मन्दिरम् अध्यासि।
Summary
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The capital cities of enemy kings, which had virtually turned into deep forests because their masters were wandering from forest to forest in fear of this king, were after a long time regained by them, and they re-occupied their own pleasure palaces.
पदच्छेदः
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| इतः | इतः | from this (king) |
| भिया | भी (३.१) | out of fear |
| भूपतिभिः | भूपति (३.३) | by the kings |
| वनं | वन (२.१) | forest |
| वनात् | वन (५.१) | from forest |
| अटद्भिः | अटत् (√अट्+शतृ, ३.३) | by the wandering ones |
| उच्चैः | उच्चैस् | greatly |
| अटवीत्वम् | अटवीत्व (२.१) | the state of being a forest |
| ईयुषी | ईयिवस् (√इ+क्वसु, १.१) | which had attained |
| निजापि | निज (१.१)–अपि | their own also |
| सावापि | तद् (१.१)–अवापि (अव√आप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | that was regained |
| चिरात् | चिरात् | after a long time |
| पुनः | पुनः | again |
| पुरी | पुरी (१.१) | city |
| पुनः | पुनः | again |
| स्वम् | स्व (२.१) | their own |
| अध्यासि | अध्यासि (अधि√आस् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was occupied |
| विलासमन्दिरम् | विलास-मन्दिर (२.१) | pleasure palace |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | तो | भि | या | भू | प | ति | भि | र्व | नं | व | ना |
| द | ट | द्भि | रु | च्चै | र | ट | वी | त्व | मी | यु | षी |
| नि | जा | पि | सा | वा | पि | चि | रा | त्पु | नः | पु | री |
| पु | नः | स्व | म | ध्या | सि | वि | ला | स | म | न्दि | रम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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