श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तस्य द्वादश एष मातृचरणाम्भोजालिमौलेर्महा-
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तस्य द्वादश एष मातृचरणाम्भोजालिमौलेर्महा-
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तस्य द्वादश एष मातृचरणाम्भोजालिमौलेर्महा-
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
अन्वयः
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कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः श्रीहीरः च मामल्लदेवी च जित-इन्द्रिय-चयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तस्य मातृ-चरण-अम्भोज-अलि-मौलेः नलस्य चरिते महाकाव्ये निसर्ग-उज्ज्वलः अयम् एषः द्वादशः सर्गः वि-अगलत् ।
Summary
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Srihira, a diamond ornamenting the crowns of the best poets, and Mamalladevi gave birth to a son, Sriharsha, who had conquered his senses. In his great epic, the 'Charita of Nala,' this naturally brilliant twelfth canto has now concluded—composed by him whose crest is like a bee at his mother's lotus-feet.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः | कवि–राज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | a diamond ornamenting the crowns of the row of king-poets |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जित-इन्द्रिय-चयम् | जित (√जि+क्त)–इन्द्रिय–चय (२.१) | one who has conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| द्वादशः | द्वादश (१.१) | twelfth |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| मातृ-चरण-अम्भोज-अलि-मौलेः | मातृ–चरण–अम्भोज–अलि–मौलि (६.१) | of him whose crest is a bee at the lotus-feet of his mother |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| व्यगलत् | व्यगलत् (वि√गल् लङ् प्र.पु. एक.) | has concluded |
| नलस्य | नल (६.१) | of Nala |
| चरिते | चरित (७.१) | in the story of |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| निसर्ग-उज्ज्वलः | निसर्ग–उज्ज्वल (१.१) | naturally brilliant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| त | स्य | द्वा | द | श | ए | ष | मा | तृ | च | र | णा | म्भो | जा | लि | मौ | ले | र्म | हा |
| का | व्ये | ऽयं | व्य | ग | ल | न्न | ल | स्य | च | रि | ते | स | र्गो | नि | स | र्गो | ज्ज्व | लः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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