सर्वस्वं चेतसस्तां नृपतिरपि दृशे प्रीतिदायं प्रदाय
प्रापत्तद्दृष्टिमिष्टातिथिममरदुरापामपाङ्गोत्तरङ्गम् ।
आनन्दान्ध्येन वन्ध्यानकृत तदपराकूतपातान्स रत्याः
पत्या पीयूषधारावलनविरचितेनाशुगेनाशु लीढः ॥
सर्वस्वं चेतसस्तां नृपतिरपि दृशे प्रीतिदायं प्रदाय
प्रापत्तद्दृष्टिमिष्टातिथिममरदुरापामपाङ्गोत्तरङ्गम् ।
आनन्दान्ध्येन वन्ध्यानकृत तदपराकूतपातान्स रत्याः
पत्या पीयूषधारावलनविरचितेनाशुगेनाशु लीढः ॥
प्रापत्तद्दृष्टिमिष्टातिथिममरदुरापामपाङ्गोत्तरङ्गम् ।
आनन्दान्ध्येन वन्ध्यानकृत तदपराकूतपातान्स रत्याः
पत्या पीयूषधारावलनविरचितेनाशुगेनाशु लीढः ॥
अन्वयः
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नृपतिः अपि चेतसः सर्वस्वम् प्रीति-दायम् ताम् दृशे प्रदाय, इष्ट-अतिथिम् अमर-दुरापाम् अपाङ्ग-उत्तरङ्गम् तत्-दृष्टिम् प्रापत् । सः रत्याः पत्या पीयूष-धारा-वलन-विरचितेन आशुगेन आशु लीढः (सन्) आनन्द-अन्ध्येन तत्-अपर-आकूत-पातान् वन्ध्यान् अकृत ।
Summary
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The king (Nala), having presented her—the entire wealth of his heart—as a gift to his eyes, received her gaze, a welcome guest difficult even for gods to obtain, full of waves of sidelong glances. Struck quickly by Kamadeva's arrow, fashioned from streams of nectar, he, blinded by bliss, rendered futile the intentional glances of others.
पदच्छेदः
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| सर्वस्वम् | सर्वस्व (२.१) | the entire wealth |
| चेतसः | चेतस् (६.१) | of the heart |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| नृपतिः | नृपति (१.१) | the king |
| अपि | अपि | also |
| दृशे | दृश् (४.१) | to the eye |
| प्रीति-दायम् | प्रीति–दाय (२.१) | a gift of love |
| प्रदाय | प्रदाय (प्र√दा+ल्यप्) | having given |
| प्रापत् | प्रापत् (प्र√आप् लुङ् प्र.पु. एक.) | obtained |
| तत्-दृष्टिम् | तद्–दृष्टि (२.१) | her gaze |
| इष्ट-अतिथिम् | इष्ट–अतिथि (२.१) | a welcome guest |
| अमर-दुरापाम् | अमर–दुराप (२.१) | difficult for even gods to obtain |
| अपाङ्ग-उत्तरङ्गम् | अपाङ्ग–उत्तरङ्ग (२.१) | with high waves of sidelong glances |
| आनन्द-अन्ध्येन | आनन्द–अन्ध्य (३.१) | due to the blindness of bliss |
| वन्ध्यान् | वन्ध्य (२.३) | futile |
| अकृत | अकृत (√कृ लुङ् प्र.पु. एक.) | made |
| तत्-अपर-आकूत-पातान् | तत्–अपर–आकूत–पात (२.३) | the intentional glances of others |
| सः | तद् (१.१) | he |
| रत्याः | रति (६.१) | of Rati |
| पत्या | पति (३.१) | by the husband (Kamadeva) |
| पीयूष-धारा-वलन-विरचितेन | पीयूष–धारा–वलन–विरचित (वि√रच्+क्त, ३.१) | by the one made from the flow of streams of nectar |
| आशुगेन | आशुग (३.१) | by the arrow |
| आशु | आशु | quickly |
| लीढः | लीढ (√लिह्+क्त, १.१) | struck |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र्व | स्वं | चे | त | स | स्तां | नृ | प | ति | र | पि | दृ | शे | प्री | ति | दा | यं | प्र | दा | य |
| प्रा | प | त्त | द्दृ | ष्टि | मि | ष्टा | ति | थि | म | म | र | दु | रा | पा | म | पा | ङ्गो | त्त | र | ङ्गम् |
| आ | न | न्दा | न्ध्ये | न | व | न्ध्या | न | कृ | त | त | द | प | रा | कू | त | पा | ता | न्स | र | त्याः |
| प | त्या | पी | यू | ष | धा | रा | व | ल | न | वि | र | चि | ते | ना | शु | गे | ना | शु | ली | ढः |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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