तन्नालीकनले चलेतरमनाः साम्यान्मनागप्यभू-
दप्यग्रे चतुरः स्थितान्न चतुरा पातुं दृशा नैषधान् ।
आनन्दाम्बुनिधौ निमज्ज्य नितरां दूरं गता तत्तला-
लंकारीभवनाज्जनाय ददती पातालकन्याभ्रमम् ॥
तन्नालीकनले चलेतरमनाः साम्यान्मनागप्यभू-
दप्यग्रे चतुरः स्थितान्न चतुरा पातुं दृशा नैषधान् ।
आनन्दाम्बुनिधौ निमज्ज्य नितरां दूरं गता तत्तला-
लंकारीभवनाज्जनाय ददती पातालकन्याभ्रमम् ॥
दप्यग्रे चतुरः स्थितान्न चतुरा पातुं दृशा नैषधान् ।
आनन्दाम्बुनिधौ निमज्ज्य नितरां दूरं गता तत्तला-
लंकारीभवनाज्जनाय ददती पातालकन्याभ्रमम् ॥
अन्वयः
AI
चलेतर-मनाः (सा) तत्-नालीक-नले साम्यात् मनाक् अपि (चलिता) न अभूत् । अग्रे स्थितान् चतुरः नैषधान् दृशा पातुम् अपि चतुरा न (अभूत्) । (सा) आनन्द-अम्बु-निधौ नितराम् निमज्ज्य दूरम् गता, तत्-तल-अलंकारी-भवनात् जनाय पाताल-कन्या-भ्रमम् ददती (आसीत्) ।
Summary
AI
Her mind, unmoving, was fixed on the lotus that was Nala. Due to the similarity (of the four Nalas), she was not even slightly moved, nor was she able to 'drink in' the four Nishadha princes with her eyes. Plunging deep into the ocean of joy, she went so far as to become an ornament at its bottom, creating for the people the illusion that she was a maiden from the netherworld.
पदच्छेदः
AI
| तन्नालीकनले | तद्–नालीक–नल (७.१) | in that lotus, Nala |
| चलेतरमनाः | चलेतर–मनस् (१.१) | she whose mind was unmoving |
| साम्यात् | साम्य (५.१) | due to similarity |
| मनाक् | मनाक् | a little |
| अपि | अपि | even |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| अपि | अपि | also |
| अग्रे | अग्र | in front |
| चतुरः | चतुर् (२.३) | four |
| स्थितान् | स्थित (√स्था+क्त, २.३) | standing |
| न | न | not |
| चतुरा | चतुरा (१.१) | clever, able |
| पातुं | पातुम् (√पा+तुमुन्) | to drink |
| दृशा | दृश् (३.१) | with her eye |
| नैषधान् | नैषध (२.३) | the Nishadha princes |
| आनन्दाम्बुनिधौ | आनन्द–अम्बुनिधि (७.१) | in the ocean of joy |
| निमज्ज्य | निमज्ज्य (नि√मस्ज्+ल्यप्) | having plunged |
| नितरां | नितराम् | completely |
| दूरं | दूरम् | far |
| गता | गत (√गम्+क्त, १.१) | gone |
| तत्तलालंकारीभवनात् | तद्–तल–अलंकारीभवन (५.१) | from becoming an ornament of its bottom |
| जनाय | जन (४.१) | to the people |
| ददती | ददती (√दा+शतृ, १.१) | giving |
| पातालकन्याभ्रमम् | पातालकन्या–भ्रम (२.१) | the illusion of being a maiden of the netherworld |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | न्ना | ली | क | न | ले | च | ले | त | र | म | नाः | सा | म्या | न्म | ना | ग | प्य | भू |
| द | प्य | ग्रे | च | तु | रः | स्थि | ता | न्न | च | तु | रा | पा | तुं | दृ | शा | नै | ष | धान् |
| आ | न | न्दा | म्बु | नि | धौ | नि | म | ज्ज्य | नि | त | रां | दू | रं | ग | ता | त | त्त | ला |
| लं | का | री | भ | व | ना | ज्ज | ना | य | द | द | ती | पा | ता | ल | क | न्या | भ्र | मम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.