दृशा नलस्य श्रुतिचुम्बिनेषुणा
करेऽपि चक्रच्छलनम्रकार्मुकः ।
स्मरः पराङ्गैरनुकल्प्य धन्वितां
जनीमनङ्गः स्वयमार्दयत्ततः ॥
दृशा नलस्य श्रुतिचुम्बिनेषुणा
करेऽपि चक्रच्छलनम्रकार्मुकः ।
स्मरः पराङ्गैरनुकल्प्य धन्वितां
जनीमनङ्गः स्वयमार्दयत्ततः ॥
करेऽपि चक्रच्छलनम्रकार्मुकः ।
स्मरः पराङ्गैरनुकल्प्य धन्वितां
जनीमनङ्गः स्वयमार्दयत्ततः ॥
अन्वयः
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ततः अनङ्गः स्मरः नलस्य श्रुति-चुम्बिना दृशा इषुणा, करे अपि चक्र-छल-नम्र-कार्मुकः (सन्), पर-अङ्गैः धन्विताम् अनुकल्प्य, जनीम् स्वयम् आर्दयत् ।
Summary
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Then, the bodiless Kamadeva, using Nala's ear-touching glance as his arrow and Nala's hand (holding a discus) as his bent bow, fashioned himself an archer out of another's limbs and tormented the woman, Damayanti, himself.
पदच्छेदः
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| दृशा | दृश् (३.१) | with the eye |
| नलस्य | नल (६.१) | of Nala |
| श्रुतिचुम्बिनेषुणा | श्रुतिचुम्बिन्–इषु (३.१) | with the arrow that touched his ear |
| करे | कर (७.१) | in his hand |
| अपि | अपि | also |
| चक्रच्छलनम्रकार्मुकः | चक्र–छल–नम्र–कार्मुक (१.१) | whose bow was bent on the pretext of a discus |
| स्मरः | स्मर (१.१) | Kamadeva |
| पराङ्गैरनुकल्प्य | पर–अङ्ग (३.३)–अनुकल्प्य (अनु√कल्प्+ल्यप्) | having fashioned with another's limbs |
| धन्वितां | धन्विता (२.१) | the state of being an archer |
| जनीम् | जनी (२.१) | the woman (Damayanti) |
| अनङ्गः | अनङ्ग (१.१) | the bodiless one (Kamadeva) |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| आर्दयत् | आर्दयत् (√अर्द् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | tormented |
| ततः | ततः | then |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृ | शा | न | ल | स्य | श्रु | ति | चु | म्बि | ने | षु | णा |
| क | रे | ऽपि | च | क्र | च्छ | ल | न | म्र | का | र्मु | कः |
| स्म | रः | प | रा | ङ्गै | र | नु | क | ल्प्य | ध | न्वि | तां |
| ज | नी | म | न | ङ्गः | स्व | य | मा | र्द | य | त्त | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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