वृद्धो वार्धिरसौ तरङ्गवलिभं बिभ्रद्वपुः पाण्डुरं
हंसालीपलितेन यष्टिकलितस्तावद्वयोर्बंहिमा ।
बिभ्रच्चन्द्रिकया च कं विकचया योग्यस्फुरत्संगतं
स्थाने स्नानविधायिधार्मिकशिरोनत्यापि नित्यादृतः ॥
वृद्धो वार्धिरसौ तरङ्गवलिभं बिभ्रद्वपुः पाण्डुरं
हंसालीपलितेन यष्टिकलितस्तावद्वयोर्बंहिमा ।
बिभ्रच्चन्द्रिकया च कं विकचया योग्यस्फुरत्संगतं
स्थाने स्नानविधायिधार्मिकशिरोनत्यापि नित्यादृतः ॥
हंसालीपलितेन यष्टिकलितस्तावद्वयोर्बंहिमा ।
बिभ्रच्चन्द्रिकया च कं विकचया योग्यस्फुरत्संगतं
स्थाने स्नानविधायिधार्मिकशिरोनत्यापि नित्यादृतः ॥
अन्वयः
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असौ वार्धिः वृद्धः (इव) । तरङ्ग-वलि-भम् पाण्डुरम् वपुः बिभ्रत्, हंस-आली-पलितेन यष्टि-कलितः, तावत्-वयोः बंहिमा (बिभ्रत्) । विकचया चन्द्रिकया योग्य-स्फुरत्-संगतम् कम् च बिभ्रत् । स्थाने (एव) स्नान-विधायि-धार्मिक-शिरः-नत्या अपि नित्य-आदृतः (अस्ति) ।
Summary
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That ocean is like an old man: his body is pale with waves for wrinkles, a line of swans for grey hair, and foam for a staff. He holds water (or a head) shining with moonlight (or a white umbrella). It is fitting that he is always honored by the bowing heads of the pious who perform their ablutions in him.
पदच्छेदः
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| वृद्धः | वृद्ध (१.१) | old |
| वार्धिः | वार्धि (१.१) | ocean |
| असौ | अदस् (१.१) | that |
| तरङ्गवलिभं | तरङ्ग–वलि–भ (२.१) | resembling wrinkles of waves |
| बिभ्रत् | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, १.१) | bearing |
| वपुः | वपुस् (२.१) | body |
| पाण्डुरं | पाण्डुर (२.१) | pale white |
| हंसालीपलितेन | हंस–आली–पलित (३.१) | with the line of swans as grey hair |
| यष्टिकलितः | यष्टि–कलित (१.१) | holding a staff |
| तावद्वयोर्बंहिमा | तावद्वयस्–बंहिमन् (१.१) | the greatness of such an age |
| बिभ्रत् | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, १.१) | bearing |
| चन्द्रिकया | चन्द्रिका (३.१) | with moonlight / white umbrella |
| च | च | and |
| कं | क (२.१) | head / water |
| विकचया | विकच (३.१) | blooming |
| योग्यस्फुरत्संगतं | योग्य–स्फुरत्–संगत (२.१) | having a suitably shining union |
| स्थाने | स्थाने | it is fitting |
| स्नानविधायिधार्मिकशिरोनत्यापि | स्नानविधायिन्–धार्मिक–शिरस्–नति (३.१)–अपि | even by the bowing of the heads of pious people performing ablutions |
| नित्यादृतः | नित्य–आदृत (१.१) | always honored |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वृ | द्धो | वा | र्धि | र | सौ | त | र | ङ्ग | व | लि | भं | बि | भ्र | द्व | पुः | पा | ण्डु | रं |
| हं | सा | ली | प | लि | ते | न | य | ष्टि | क | लि | त | स्ता | व | द्व | यो | र्बं | हि | मा |
| बि | भ्र | च्च | न्द्रि | क | या | च | कं | वि | क | च | या | यो | ग्य | स्फु | र | त्सं | ग | तं |
| स्था | ने | स्ना | न | वि | धा | यि | धा | र्मि | क | शि | रो | न | त्या | पि | नि | त्या | दृ | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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