एतद्गुणश्रवणकालविजृम्भमाण-
तल्लोचनाञ्चलनिकोचनसूचितस्य ।
भावस्य चक्ररुचितं शिबिकाभृतस्ते
तामेकतः क्षितिपतेरपरं नयन्तः ॥
एतद्गुणश्रवणकालविजृम्भमाण-
तल्लोचनाञ्चलनिकोचनसूचितस्य ।
भावस्य चक्ररुचितं शिबिकाभृतस्ते
तामेकतः क्षितिपतेरपरं नयन्तः ॥
तल्लोचनाञ्चलनिकोचनसूचितस्य ।
भावस्य चक्ररुचितं शिबिकाभृतस्ते
तामेकतः क्षितिपतेरपरं नयन्तः ॥
अन्वयः
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ते शिबिकाभृतः ताम् एकतः क्षितिपतेः अपरम् नयन्तः (सन्तः), एतत्-गुण-श्रवण-काल-विजृम्भमाण-तत्-लोचन-अञ्चल-निकोचन-सूचितस्य भावस्य उचितम् चक्रुः ।
Summary
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As they carried her from that king to another, the palanquin bearers acted appropriately in response to her feelings, which were indicated by the slight closing of the corners of her eyes that had widened upon hearing of his virtues.
पदच्छेदः
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| एतद्गुणश्रवणकालविजृम्भमाणतल्लोचनाञ्चलनिकोचनसूचितस्य | एतत्–गुण–श्रवण–काल–विजृम्भमाण–तत्–लोचन–अञ्चल–निकोचन–सूचित (६.१) | of the feeling indicated by the closing of the corners of her eyes, which widened at the time of hearing his virtues |
| भावस्य | भाव (६.१) | of the emotion |
| चक्रुः | चक्रुः (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | did |
| उचितम् | उचित (२.१) | what was appropriate |
| शिबिकाभृतः | शिबिका–भृत् (१.३) | the palanquin bearers |
| ते | तद् (१.३) | they |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| एकतः | एकतः | from one |
| क्षितिपतेः | क्षितिपति (५.१) | from the king |
| अपरम् | अपर (२.१) | to another |
| नयन्तः | नयत् (√नी, १.३) | carrying |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | द्गु | ण | श्र | व | ण | का | ल | वि | जृ | म्भ | मा | ण |
| त | ल्लो | च | ना | ञ्च | ल | नि | को | च | न | सू | चि | त | स्य |
| भा | व | स्य | च | क्र | रु | चि | तं | शि | बि | का | भृ | त | स्ते |
| ता | मे | क | तः | क्षि | ति | प | ते | र | प | रं | न | य | न्तः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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