तद्वीपलक्ष्मपृथुशाल्मलितूलजालैः
क्षोणीतले मृदुनि मारुतचारुकीर्णैः ।
लीलाविहारसमये चरणार्पणानि
योग्यानि ते सरससारसकोशमृद्वि ॥
तद्वीपलक्ष्मपृथुशाल्मलितूलजालैः
क्षोणीतले मृदुनि मारुतचारुकीर्णैः ।
लीलाविहारसमये चरणार्पणानि
योग्यानि ते सरससारसकोशमृद्वि ॥
क्षोणीतले मृदुनि मारुतचारुकीर्णैः ।
लीलाविहारसमये चरणार्पणानि
योग्यानि ते सरससारसकोशमृद्वि ॥
अन्वयः
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सरस-सारस-कोश-मृद्वि, लीला-विहार-समये मारुत-चारु-कीर्णैः तत्-द्वीप-लक्ष्म-पृथु-शाल्मलि-तूल-जालैः मृदुनि क्षोणीतले ते चरण-अर्पणानि योग्यानि (भविष्यन्ति) ।
Summary
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"O you who are as soft as a fresh lotus bud, during your playful strolls, the soft ground, beautifully scattered by the wind with masses of cotton from the great Shalmali tree—the emblem of that island—will be worthy of your footsteps."
पदच्छेदः
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| तद्वीपलक्ष्मपृथुशाल्मलितूलजालैः | तद्–द्वीप–लक्ष्म–पृथु–शाल्मलि–तूल–जाल (३.३) | by the masses of cotton from the great Shalmali tree which is the emblem of that island |
| क्षोणीतले | क्षोणी–तल (७.१) | on the surface of the earth |
| मृदुनि | मृदु (७.१) | on the soft |
| मारुतचारुकीर्णैः | मारुत–चारु–कीर्ण (√कॄ+क्त, ३.३) | beautifully scattered by the wind |
| लीलाविहारसमये | लीला–विहार–समय (७.१) | at the time of playful strolls |
| चरणार्पणानि | चरण–अर्पण (१.३) | the placing of feet |
| योग्यानि | योग्य (१.३) | are suitable |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| सरससारसकोशमृद्वि | सरस–सारस–कोश–मृद्वी (८.१) | O one who is as soft as a fresh lotus bud |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द्वी | प | ल | क्ष्म | पृ | थु | शा | ल्म | लि | तू | ल | जा | लैः |
| क्षो | णी | त | ले | मृ | दु | नि | मा | रु | त | चा | रु | की | र्णैः |
| ली | ला | वि | हा | र | स | म | ये | च | र | णा | र्प | णा | नि |
| यो | ग्या | नि | ते | स | र | स | सा | र | स | को | श | मृ | द्वि |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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