ते निन्यिरे नृपतिमन्यमिमाममुष्माद्
अंसावतंसशिबिकांशभृतः पुमांसः ।
रत्नाकरादिव तुषारमयूखलेखां
लेखानुजीविपुरुषा गिरिशोत्तमाङ्गम् ॥
ते निन्यिरे नृपतिमन्यमिमाममुष्माद्
अंसावतंसशिबिकांशभृतः पुमांसः ।
रत्नाकरादिव तुषारमयूखलेखां
लेखानुजीविपुरुषा गिरिशोत्तमाङ्गम् ॥
अंसावतंसशिबिकांशभृतः पुमांसः ।
रत्नाकरादिव तुषारमयूखलेखां
लेखानुजीविपुरुषा गिरिशोत्तमाङ्गम् ॥
अन्वयः
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अंश-अवतंस-शिबिका-अंश-भृतः ते पुमांसः अमुष्मात् इमाम् अन्यम् नृपतिम् (प्रति) निन्यिरे, लेख-अनुजीवि-पुरुषाः रत्नाकरात् तुषार-मयूख-लेखाम् गिरिश-उत्तमाङ्गम् इव ।
Summary
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Those men, who bore the palanquin on their shoulders, carried her away from that king (Yama) to another king, just as the servants of the gods carry the digit of the moon from the ocean to the head of Shiva.
पदच्छेदः
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| ते | तद् (१.३) | those |
| निन्यिरे | निन्यिरे (√नी कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | carried |
| नृपतिम् | नृपति (२.१) | king |
| अन्यम् | अन्य (२.१) | another |
| इमाम् | इदम् (२.१) | this one (Damayanti) |
| अमुष्मात् | अदस् (५.१) | from that one (Yama) |
| अंसावतंसशिबिकांशभृतः | अंस–अवतंस–शिबिका–अंश–भृत् (१.३) | men who bore the parts of the palanquin that rested on their shoulders |
| पुमांसः | पुंस् (१.३) | men |
| रत्नाकरात् | रत्नाकर (५.१) | from the ocean |
| इव | इव | like |
| तुषारमयूखलेखां | तुषार-मयूख-लेखा (२.१) | the digit of the cool-rayed moon |
| लेखानुजीविपुरुषाः | लेख–अनुजीविन्–पुरुष (१.३) | the men who serve the gods |
| गिरिशोत्तमाङ्गम् | गिरिश-उत्तमाङ्ग (२.१) | to the head of Girisha (Shiva) |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | नि | न्यि | रे | नृ | प | ति | म | न्य | मि | मा | म | मु | ष्मा |
| दं | सा | व | तं | स | शि | बि | कां | श | भृ | तः | पु | मां | सः |
| र | त्ना | क | रा | दि | व | तु | षा | र | म | यू | ख | ले | खां |
| ले | खा | नु | जी | वि | पु | रु | षा | गि | रि | शो | त्त | मा | ङ्गम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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