बालातपैः कृतकगैरिकतां कृतां द्विः
तत्रोदयाचलशिलाः परिशीलयन्तु ।
त्वद्विभ्रमभ्रमणजश्रमवारिधारि-
पादाङ्गुलीगलितया नखलाक्षयापि ॥
बालातपैः कृतकगैरिकतां कृतां द्विः
तत्रोदयाचलशिलाः परिशीलयन्तु ।
त्वद्विभ्रमभ्रमणजश्रमवारिधारि-
पादाङ्गुलीगलितया नखलाक्षयापि ॥
तत्रोदयाचलशिलाः परिशीलयन्तु ।
त्वद्विभ्रमभ्रमणजश्रमवारिधारि-
पादाङ्गुलीगलितया नखलाक्षयापि ॥
अन्वयः
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तत्र उदय-अचल-शिलाः बाल-आतपैः कृताम् कृतक-गैरिकताम् द्विः परिशीलयन्तु, त्वत्-विभ्रम-भ्रमण-ज-श्रम-वारि-धारि-पाद-अङ्गुली-गलितया नख-लाक्षया अपि (कृताम् कृतक-गैरिकताम् द्विः परिशीलयन्तु) ।
Summary
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There, may the rocks of the Udaya mountain twice attain an artificial redness: once from the rays of the morning sun, and again from the lac-dye of your toenails, which has trickled down with the sweat from your feet, produced by the fatigue of your graceful wanderings.
पदच्छेदः
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| बालातपैः | बाल-आतप (३.३) | by the morning sun's rays |
| कृतकगैरिकतां | कृतक-गैरिकता (२.१) | an artificial redness |
| कृतां | कृत (√कृ+क्त, २.१) | made |
| द्विः | द्विः | twice |
| तत्र | तत्र | there |
| उदयाचलशिलाः | उदय-अचल-शिला (१.३) | the rocks of the Udaya mountain |
| परिशीलयन्तु | परिशीलयन्तु (परि√शील् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | may they attain |
| त्वद्विभ्रमभ्रमणजश्रमवारिधारिपादाङ्गुलीगलितया | त्वत्–विभ्रम–भ्रमण–ज–श्रम–वारि–धारिन्–पाद–अङ्गुली–गलित (३.१) | by that which has trickled from your toes bearing the water (sweat) of fatigue born from wandering with graceful movements |
| नखलाक्षया | नख-लाक्षा (३.१) | by the lac-dye of the nails |
| अपि | अपि | also |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बा | ला | त | पैः | कृ | त | क | गै | रि | क | तां | कृ | तां | द्विः |
| त | त्रो | द | या | च | ल | शि | लाः | प | रि | शी | ल | य | न्तु |
| त्व | द्वि | भ्र | म | भ्र | म | ण | ज | श्र | म | वा | रि | धा | रि |
| पा | दा | ङ्गु | ली | ग | लि | त | या | न | ख | ला | क्ष | या | पि |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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