कल्लोलजालचलनोपनतेन पीवा
जीवातुनानवरतेन पयोरसेन ।
अस्मिन्नखण्डपरिमण्डलितोरुमूर्तिः
अध्यास्यते मधुभिदा भुजगाधिराजः ॥
कल्लोलजालचलनोपनतेन पीवा
जीवातुनानवरतेन पयोरसेन ।
अस्मिन्नखण्डपरिमण्डलितोरुमूर्तिः
अध्यास्यते मधुभिदा भुजगाधिराजः ॥
जीवातुनानवरतेन पयोरसेन ।
अस्मिन्नखण्डपरिमण्डलितोरुमूर्तिः
अध्यास्यते मधुभिदा भुजगाधिराजः ॥
अन्वयः
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अस्मिन् क्षीरार्णवे कल्लोल-जाल-चलन-उपनतेन अनवरतेन जीवातुना पयः-रसेन पीवा, अखण्ड-परिमण्डलित-उरु-मूर्तिः भुजग-अधिराजः मधु-भिदा अध्यास्यते ।
Summary
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In this Ocean of Milk, the king of serpents, Shesha, grown large from the incessant, life-giving essence of milk brought by the moving waves, is sat upon by Vishnu. His vast body is coiled in an unbroken circle.
पदच्छेदः
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| कल्लोलजालचलनोपनतेन | कल्लोल–जाल–चलन–उपनत (३.१) | brought by the movement of the multitude of waves |
| पीवा | पीवन् (१.१) | large |
| जीवातुना | जीवातु (३.१) | by the life-giving |
| अनवरतेन | अनवरत (३.१) | by the incessant |
| पयोरसेन | पयस्–रस (३.१) | by the essence of milk |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| अखण्डपरिमण्डलितोरुमूर्तिः | अखण्ड–परिमण्डलित–उरु–मूर्ति (१.१) | whose vast body is coiled in an unbroken circle |
| अध्यास्यते | अध्यास्यते (अधि√आस् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is sat upon |
| मधुभिदा | मधुभिद् (३.१) | by the slayer of Madhu, Vishnu |
| भुजगाधिराजः | भुजग–अधिराज (१.१) | the king of serpents, Shesha |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | ल्लो | ल | जा | ल | च | ल | नो | प | न | ते | न | पी | वा |
| जी | वा | तु | ना | न | व | र | ते | न | प | यो | र | से | न |
| अ | स्मि | न्न | ख | ण्ड | प | रि | म | ण्ड | लि | तो | रु | मू | र्तिः |
| अ | ध्या | स्य | ते | म | धु | भि | दा | भु | ज | गा | धि | रा | जः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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