कुर्वद्भिरात्मभवसौरभसंप्रदानं
भूपालचक्रचलचामरमारुतौघम् ।
आलोकनाय दिवि संचरतां सुराणां
तत्रार्चनाविधिरभूदधिवासधूपैः ॥
कुर्वद्भिरात्मभवसौरभसंप्रदानं
भूपालचक्रचलचामरमारुतौघम् ।
आलोकनाय दिवि संचरतां सुराणां
तत्रार्चनाविधिरभूदधिवासधूपैः ॥
भूपालचक्रचलचामरमारुतौघम् ।
आलोकनाय दिवि संचरतां सुराणां
तत्रार्चनाविधिरभूदधिवासधूपैः ॥
अन्वयः
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तत्र दिवि आलोकनाय संचरताम् सुराणाम् अर्चनाविधिः, आत्मभवसौरभसंप्रदानं कुर्वद्भिः भूपालचक्रचलचामरमारुतौघैः अधिवासधूपैः अभूत् ।
Summary
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For the gods moving in the sky to watch, a rite of worship was performed there. This rite was the perfumed incense of the wind streams from the moving chowries of the assembly of kings, which were imparting the fragrance of their own bodies.
पदच्छेदः
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| कुर्वद्भिः | कुर्वत् (√कृ+शतृ, ३.३) | by those making |
| आत्मभव | आत्मभव | of one's own body (or, of Kama) |
| सौरभ | सौरभ | fragrance |
| संप्रदानम् | दान (सम्+प्र√दान, २.१) | the imparting |
| भूपाल | भूपाल | king |
| चक्र | चक्र | assembly |
| चल | चल् | moving |
| चामर | चामर | chowrie |
| मारुत | मारुत | wind |
| ओघम् | ओघ (२.१) | the stream of |
| आलोकनाय | आलोकन (४.१) | for watching |
| दिवि | द्यो (७.१) | in the sky |
| संचरताम् | संचरत् (सम्√चर्+शतृ, ६.३) | of the moving |
| सुराणाम् | सुर (६.३) | gods |
| तत्र | तत्र | there |
| अर्चना | अर्चना | worship |
| विधिः | विधि (१.१) | rite |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | took place |
| अधिवास | अधिवास | perfumed |
| धूपैः | धूप (३.३) | with incenses |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | र्व | द्भि | रा | त्म | भ | व | सौ | र | भ | सं | प्र | दा | नं |
| भू | पा | ल | च | क्र | च | ल | चा | म | र | मा | रु | तौ | घम् |
| आ | लो | क | ना | य | दि | वि | सं | च | र | तां | सु | रा | णां |
| त | त्रा | र्च | ना | वि | धि | र | भू | द | धि | वा | स | धू | पैः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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