शाकः शुकच्छदसमच्छविपत्त्रमाल-
भारी हरिष्यति तरुस्तव तत्र चित्तम् ।
यत्पल्लवौघपरिरम्भविजृम्भितेन
ख्याता जगत्सु हरितो हरितः स्फुरन्ति ॥
शाकः शुकच्छदसमच्छविपत्त्रमाल-
भारी हरिष्यति तरुस्तव तत्र चित्तम् ।
यत्पल्लवौघपरिरम्भविजृम्भितेन
ख्याता जगत्सु हरितो हरितः स्फुरन्ति ॥
भारी हरिष्यति तरुस्तव तत्र चित्तम् ।
यत्पल्लवौघपरिरम्भविजृम्भितेन
ख्याता जगत्सु हरितो हरितः स्फुरन्ति ॥
अन्वयः
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तत्र शुक-छद-सम-छवि-पत्त्र-माल-भारी शाकः तरुः तव चित्तम् हरिष्यति । यत्-पल्लव-ओघ-परिरम्भ-विजृम्भितेन ख्याता हरितः जगत्सु हरितः स्फुरन्ति ।
Summary
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"There, the Shaka tree, bearing garlands of leaves with a lustre like a parrot's wing, will captivate your mind. It is by the embrace of its multitude of new leaves that the directions, famous throughout the worlds, shine with a green hue."
पदच्छेदः
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| शाकः | शाक (१.१) | the Shaka tree |
| शुक-छद-सम-छवि-पत्त्र-माल-भारी | शुक–छद–सम–छवि–पत्त्र–माल–भारिन् (१.१) | bearing garlands of leaves with lustre like a parrot's wing |
| हरिष्यति | हरिष्यति (√हृ लृट् प्र.पु. एक.) | will steal |
| तरुः | तरु (१.१) | the tree |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| तत्र | तत्र | there |
| चित्तम् | चित्त (२.१) | mind |
| यत्-पल्लव-ओघ-परिरम्भ-विजृम्भितेन | यद्–पल्लव–ओघ–परिरम्भ (परि√रभ्)–विजृम्भित (वि√जृम्भ्+क्त, ३.१) | by the manifestation of the embrace of its multitude of sprouts |
| ख्याता | ख्यात (√ख्या+क्त, १.३) | famous |
| जगत्सु | जगत् (७.३) | in the worlds |
| हरितः | हरित् (१.३) | the directions |
| हरितः | हरित (१.३) | green |
| स्फुरन्ति | स्फुरन्ति (√स्फुर् लट् प्र.पु. बहु.) | shine |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शा | कः | शु | क | च्छ | द | स | म | च्छ | वि | प | त्त्र | मा | ल |
| भा | री | ह | रि | ष्य | ति | त | रु | स्त | व | त | त्र | चि | त्तम् |
| य | त्प | ल्ल | वौ | घ | प | रि | र | म्भ | वि | जृ | म्भि | ते | न |
| ख्या | ता | ज | ग | त्सु | ह | रि | तो | ह | रि | तः | स्फु | र | न्ति |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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