एतत्पुरःपठदपश्रमबन्दिवृन्द-
वाग्डम्बरैरनवकाशतरेऽम्बरेऽस्मिन् ।
उत्पत्तुमस्ति पदमेव न मत्पदानाम्
अर्थोऽपि नाऋथपुनरुक्तिषु पातुकानाम् ॥
एतत्पुरःपठदपश्रमबन्दिवृन्द-
वाग्डम्बरैरनवकाशतरेऽम्बरेऽस्मिन् ।
उत्पत्तुमस्ति पदमेव न मत्पदानाम्
अर्थोऽपि नाऋथपुनरुक्तिषु पातुकानाम् ॥
वाग्डम्बरैरनवकाशतरेऽम्बरेऽस्मिन् ।
उत्पत्तुमस्ति पदमेव न मत्पदानाम्
अर्थोऽपि नाऋथपुनरुक्तिषु पातुकानाम् ॥
अन्वयः
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एतत्-पुरः-पठत्-अपश्रम-बन्दि-वृन्द-वाक्-डम्बरैः अस्मिन् अनवकाश-तरे अम्बरे मत्-पदानाम् उत्पत्तुम् पदम् एव न अस्ति । अर्थ-पुनरुक्तिषु पातुकानाम् अर्थः अपि न अस्ति ।
Summary
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In this space, made crowded by the grandiloquent speeches of the host of bards tirelessly reciting before him, there is no room for my words to even arise. And there is no point in tautology for those who are prone to it.
पदच्छेदः
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| एतत्पुरःपठदपश्रमबन्दिवृन्दवाग्डम्बरैः | एतत्–पुरस्–पठत् (√पठ्+शतृ)–अपश्रम–बन्दिन्–वृन्द–वाच्–डम्बर (३.३) | by the grandiloquent speech of the host of bards tirelessly reciting before him |
| अनवकाशतरे | अनवकाश–तर (७.१) | in the very crowded |
| अम्बरे | अम्बर (७.१) | in the space |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| उत्पत्तुम् | उत्पत्तुम् (उत्√पत्+तुमुन्) | to arise |
| अस्ति | अस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| पदम् | पद (१.१) | space |
| एव | एव | even |
| न | न | not |
| मत्पदानाम् | अस्मद्–पद (६.३) | for my words |
| अर्थः | अर्थ (१.१) | purpose |
| अपि | अपि | also |
| न | न | not |
| अर्थपुनरुक्तिषु | अर्थ–पुनरुक्ति (७.३) | in tautologies |
| पातुकानाम् | पातुक (६.३) | of those who are prone to fall |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | त्पु | रः | प | ठ | द | प | श्र | म | ब | न्दि | वृ | न्द | |
| वा | ग्ड | म्ब | रै | र | न | व | का | श | त | रे | ऽम्ब | रे | ऽस्मिन् | |
| उ | त्प | त्तु | म | स्ति | प | द | मे | व | न | म | त्प | दा | ना | |
| म | र्थो | ऽपि | ना | ऋ | थ | पु | न | रु | क्ति | षु | पा | तु | का | नाम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | |||||||||
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