देवः स्वयं वसति तत्र किल स्वयंभूः
न्यग्रोधमण्डलतले हिमशीतले यः ।
स त्वां विलोक्य निजशिल्पमनन्यकल्पं
सर्वेषु कारुषु करोतु करेण दर्पम् ॥
देवः स्वयं वसति तत्र किल स्वयंभूः
न्यग्रोधमण्डलतले हिमशीतले यः ।
स त्वां विलोक्य निजशिल्पमनन्यकल्पं
सर्वेषु कारुषु करोतु करेण दर्पम् ॥
न्यग्रोधमण्डलतले हिमशीतले यः ।
स त्वां विलोक्य निजशिल्पमनन्यकल्पं
सर्वेषु कारुषु करोतु करेण दर्पम् ॥
अन्वयः
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यः देवः स्वयम्-भूः किल तत्र हिम-शीतले न्यग्रोध-मण्डल-तले स्वयम् वसति, सः अनन्य-कल्पम् निज-शिल्पम् त्वाम् विलोक्य सर्वेषु कारुषु करेण दर्पम् करोतु ।
Summary
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The self-born god Brahma himself dwells there at the snow-cool base of the great Banyan tree. Seeing you, his own unequalled creation, may he feel pride with his hand among all other artisans.
पदच्छेदः
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| देवः | देव (१.१) | the god |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| वसति | वसति (√वस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | dwells |
| तत्र | तत्र | there |
| किल | किल | indeed |
| स्वयंभूः | स्वयंभू (१.१) | the self-born, Brahma |
| न्यग्रोधमण्डलतले | न्यग्रोध–मण्डल–तल (७.१) | at the base of the great Banyan tree |
| हिमशीतले | हिम–शीतल (७.१) | cool as snow |
| यः | यद् (१.१) | who |
| सः | तद् (१.१) | he |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| विलोक्य | विलोक्य (वि√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| निजशिल्पम् | निज–शिल्प (२.१) | his own creation |
| अनन्यकल्पम् | अनन्य–कल्प (२.१) | unequalled |
| सर्वेषु | सर्व (७.३) | among all |
| कारुषु | कारु (७.३) | artisans |
| करोतु | करोतु (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may he feel |
| करेण | कर (३.१) | with his hand |
| दर्पम् | दर्प (२.१) | pride |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दे | वः | स्व | यं | व | स | ति | त | त्र | कि | ल | स्व | यं | भूः |
| न्य | ग्रो | ध | म | ण्ड | ल | त | ले | हि | म | शी | त | ले | यः |
| स | त्वां | वि | लो | क्य | नि | ज | शि | ल्प | म | न | न्य | क | ल्पं |
| स | र्वे | षु | का | रु | षु | क | रो | तु | क | रे | ण | द | र्पम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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