लोकेशकेशवशिवानपि यश्चकार
शृङ्गारसान्तरभृशान्तरशान्तभावान् ।
पञ्चेन्द्रियाणि जगतामिषुपञ्चकेन
संक्षोभयन्वितनुतां वितनुर्मदं वः ॥
लोकेशकेशवशिवानपि यश्चकार
शृङ्गारसान्तरभृशान्तरशान्तभावान् ।
पञ्चेन्द्रियाणि जगतामिषुपञ्चकेन
संक्षोभयन्वितनुतां वितनुर्मदं वः ॥
शृङ्गारसान्तरभृशान्तरशान्तभावान् ।
पञ्चेन्द्रियाणि जगतामिषुपञ्चकेन
संक्षोभयन्वितनुतां वितनुर्मदं वः ॥
अन्वयः
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यः वितनुः लोक-ईश-केशव-शिवान् अपि शृङ्गार-रस-अन्तर-भृश-अन्तर-शान्त-भावान् चकार, (सः) जगताम् पञ्च-इन्द्रियाणि इषु-पञ्चकेन संक्षोभयन् वः मदम् वितनुताम् ।
Summary
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May that bodiless Kamadeva, who made even Brahma, Vishnu, and Shiva have their other feelings completely subdued by the overwhelming sentiment of love, and who agitates the five senses of the worlds with his five arrows, grant you joy.
पदच्छेदः
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| लोकेशकेशवशिवान् | लोकईश–केशव–शिव (२.३) | Brahma, Vishnu, and Shiva |
| अपि | अपि | even |
| यः | यद् (१.१) | who |
| चकार | चकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| शृङ्गारसान्तरभृशान्तरशान्तभावान् | शृङ्गार–रस–अन्तर–भृश–अन्तर–शान्त–भाव (२.३) | whose other feelings were completely calmed by the sentiment of love within |
| पञ्चेन्द्रियाणि | पञ्च–इन्द्रिय (२.३) | the five senses |
| जगताम् | जगत् (६.३) | of the worlds |
| इषुपञ्चकेन | इषु–पञ्चक (३.१) | with the five arrows |
| संक्षोभयन् | संक्षोभयत् (सम्√क्षुभ्+णिच्+शतृ, १.१) | agitating |
| वितनुताम् | वितनुताम् (वि√तन् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may he grant |
| वितनुः | वितनु (१.१) | the bodiless one (Kamadeva) |
| मदम् | मद (२.१) | joy |
| वः | युष्मद् (४.३) | to you |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लो | के | श | के | श | व | शि | वा | न | पि | य | श्च | का | र |
| शृ | ङ्गा | र | सा | न्त | र | भृ | शा | न्त | र | शा | न्त | भा | वान् |
| प | ञ्चे | न्द्रि | या | णि | ज | ग | ता | मि | षु | प | ञ्च | के | न |
| सं | क्षो | भ | य | न्वि | त | नु | तां | वि | त | नु | र्म | दं | वः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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