एतस्य सावनिभुजः कुलराजधानी
काशी भवोत्तरणधर्मतरिः स्मरारेः ।
यामागता दुरितपूरितचेतसोऽपि
पापं निरस्य चिरजं विरजीभवन्ति ॥
एतस्य सावनिभुजः कुलराजधानी
काशी भवोत्तरणधर्मतरिः स्मरारेः ।
यामागता दुरितपूरितचेतसोऽपि
पापं निरस्य चिरजं विरजीभवन्ति ॥
काशी भवोत्तरणधर्मतरिः स्मरारेः ।
यामागता दुरितपूरितचेतसोऽपि
पापं निरस्य चिरजं विरजीभवन्ति ॥
अन्वयः
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एतस्य अवनिभुजः कुलराजधानी सा काशी, स्मरारेः भवोत्तरणधर्मतरिः (अस्ति) । याम् आगताः दुरितपूरितचेतसः अपि चिरजम् पापम् निरस्य विरजीभवन्ति ।
Summary
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The ancestral capital of this king is that very Kashi, which is Lord Shiva's righteous boat for crossing the ocean of worldly existence. Even those whose minds are filled with sin, upon reaching it, cast off their long-accumulated evil and become pure.
पदच्छेदः
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| एतस्य | एतद् (६.१) | of this |
| सा | तद् (१.१) | that |
| अवनिभुजः | अवनिभुज् (६.१) | king's (protector of the earth) |
| कुलराजधानी | कुल–राजधानी (१.१) | ancestral capital |
| काशी | काशी (१.१) | Kashi |
| भवोत्तरणधर्मतरिः | भव–उत्तरण–धर्म–तरि (१.१) | the righteous boat for crossing the ocean of worldly existence |
| स्मरारेः | स्मरारि (६.१) | of Shiva (enemy of Kama) |
| याम् | यद् (२.१) | which |
| आगताः | आगत (आ√गम्+क्त, १.३) | having come to |
| दुरितपूरितचेतसः | दुरित–पूरित–चेतस् (१.३) | those whose minds are filled with sin |
| अपि | अपि | even |
| पापम् | पाप (२.१) | sin |
| निरस्य | निरस्य (निर्√अस्+ल्यप्) | having cast off |
| चिरजम् | चिर–ज (२.१) | long-accumulated |
| विरजीभवन्ति | विरजीभवन्ति (√भू +च्वि कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become pure (free from dust/sin) |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | स्य | सा | व | नि | भु | जः | कु | ल | रा | ज | धा | नी |
| का | शी | भ | वो | त्त | र | ण | ध | र्म | त | रिः | स्म | रा | रेः |
| या | मा | ग | ता | दु | रि | त | पू | रि | त | चे | त | सो | ऽपि |
| पा | पं | नि | र | स्य | चि | र | जं | वि | र | जी | भ | व | न्ति |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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