पूजाविधौ मखभुजामुपयोगिनो ये
विद्वत्कराः कमलनिर्मलकान्तिभाजः ।
लक्ष्मीमनेन दधतेऽनुदिनं वितीर्णैः
ते हाटकैः स्फुटवराटकगौरगर्भाः ॥
पूजाविधौ मखभुजामुपयोगिनो ये
विद्वत्कराः कमलनिर्मलकान्तिभाजः ।
लक्ष्मीमनेन दधतेऽनुदिनं वितीर्णैः
ते हाटकैः स्फुटवराटकगौरगर्भाः ॥
विद्वत्कराः कमलनिर्मलकान्तिभाजः ।
लक्ष्मीमनेन दधतेऽनुदिनं वितीर्णैः
ते हाटकैः स्फुटवराटकगौरगर्भाः ॥
अन्वयः
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ये विद्वत्कराः मखभुजाम् पूजाविधौ उपयोगिनः कमलनिर्मलकान्तिभाजः (सन्ति), ते अनेन अनुदिनम् वितीर्णैः स्फुटवराटकगौरगर्भाः हाटकैः लक्ष्मीम् दधते ।
Summary
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The hands of scholars, useful in the worship of gods and possessing the pure splendor of lotuses, attain great beauty daily from the gold coins given by him, coins whose interiors are as bright and white as cowrie shells.
पदच्छेदः
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| पूजाविधौ | पूजा–विधि (७.१) | in the ritual of worship |
| मखभुजाम् | मखभुज् (६.३) | of the gods (sacrificial enjoyers) |
| उपयोगिनः | उपयोगिन् (१.३) | useful |
| ये | यद् (१.३) | which |
| विद्वत्कराः | विद्वस्–कर (१.३) | hands of scholars |
| कमलनिर्मलकान्तिभाजः | कमल–निर्मल–कान्ति–भाज् (१.३) | possessing the splendor of a pure lotus |
| लक्ष्मीम् | लक्ष्मी (२.१) | beauty/splendor |
| अनेन | इदम् (३.१) | by him |
| दधते | दधते (√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | attain |
| अनुदिनम् | अनुदिनम् | daily |
| वितीर्णैः | वितीर्ण (वि√तॄ+क्त, ३.३) | by the given |
| ते | तद् (१.३) | they |
| हाटकैः | हाटक (३.३) | by gold coins |
| स्फुटवराटकगौरगर्भाः | स्फुट–वराटक–गौर–गर्भ (३.३) | whose interiors are as bright and white as cowrie shells |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पू | जा | वि | धौ | म | ख | भु | जा | मु | प | यो | गि | नो | ये |
| वि | द्व | त्क | राः | क | म | ल | नि | र्म | ल | का | न्ति | भा | जः |
| ल | क्ष्मी | म | ने | न | द | ध | ते | ऽनु | दि | नं | वि | ती | र्णैः |
| ते | हा | ट | कैः | स्फु | ट | व | रा | ट | क | गौ | र | ग | र्भाः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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