स्मरं प्रसूनेन शरासनेन
जेतारमश्रद्दधतीं नलस्य ।
तस्मै स्वभूषादृषदंशुशिल्पं
बलद्विषः कार्मुकमर्पयन्तीम् ॥
स्मरं प्रसूनेन शरासनेन
जेतारमश्रद्दधतीं नलस्य ।
तस्मै स्वभूषादृषदंशुशिल्पं
बलद्विषः कार्मुकमर्पयन्तीम् ॥
जेतारमश्रद्दधतीं नलस्य ।
तस्मै स्वभूषादृषदंशुशिल्पं
बलद्विषः कार्मुकमर्पयन्तीम् ॥
अन्वयः
AI
नलस्य जेतारम् प्रसूनेन शरासनेन स्मरम् अश्रद्दधतीम्, तस्मै बल-द्विषः कार्मुकम् (इव स्थितम्) स्व-भूषा-दृषत्-अंशु-शिल्पम् अर्पयन्तीम् (तां तनूजाम् आजुहाव) ।
Summary
AI
(He summoned his daughter) who, not believing that Kama with his mere flower-bow could conquer Nala, was as if offering to Nala the bow of Indra (the rainbow), fashioned from the rays of the gems in her own ornaments.
पदच्छेदः
AI
| स्मरं | स्मर (२.१) | Kama |
| प्रसूनेन | प्रसून (३.१) | with a flower |
| शरासनेन | शरासन (३.१) | with a bow |
| जेतारम् | जेतृ (२.१) | as the conqueror |
| अश्रद्दधतीं | श्रद्दधत् (श्रत्√धा+शतृ, २.१) | not believing |
| नलस्य | नल (६.१) | of Nala |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him |
| स्वभूषादृषदंशुशिल्पं | स्व–भूषा–दृषद्–अंशु–शिल्प (२.१) | the creation made of the rays of the gems in her own ornaments |
| बलद्विषः | बलद्विष् (६.१) | of Indra |
| कार्मुकम् | कार्मुक (२.१) | the bow |
| अर्पयन्तीम् | अर्पयन्त् (√ऋ+णिच्+शतृ, २.१) | offering |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | रं | प्र | सू | ने | न | श | रा | स | ने | न |
| जे | ता | र | म | श्र | द्द | ध | तीं | न | ल | स्य |
| त | स्मै | स्व | भू | षा | दृ | ष | दं | शु | शि | ल्पं |
| ब | ल | द्वि | षः | का | र्मु | क | म | र्प | य | न्तीम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.