दासीषु नासीरचरीषु जातं
स्फीतं क्रमेणालिषु वीक्षितासु ।
स्वाङ्गेषु रूपोत्थमथाद्भुताब्धि-
मुद्वेलयन्तीमवलोककानाम् ॥
दासीषु नासीरचरीषु जातं
स्फीतं क्रमेणालिषु वीक्षितासु ।
स्वाङ्गेषु रूपोत्थमथाद्भुताब्धि-
मुद्वेलयन्तीमवलोककानाम् ॥
स्फीतं क्रमेणालिषु वीक्षितासु ।
स्वाङ्गेषु रूपोत्थमथाद्भुताब्धि-
मुद्वेलयन्तीमवलोककानाम् ॥
अन्वयः
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अथ नासीर-चरीषु दासीषु, (ततः) आलीषु क्रमेण वीक्षितासु (सतीषु), अवलोककानाम् अद्भुत-अब्धिम् जातम्, स्फीतम्, (अन्ते) स्व-अङ्गेषु रूप-उत्थम् उद्वेलयन्तीम् (तां तनूजाम् आजुहाव) ।
Summary
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(He summoned his daughter) who caused the ocean of wonder in the onlookers to overflow. This wonder first arose upon seeing her vanguard of maidservants, then swelled upon seeing her friends, and finally, upon seeing her own beautiful limbs, it surged beyond all bounds.
पदच्छेदः
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| दासीषु | दासी (७.३) | among the maidservants |
| नासीरचरीषु | नासीरचरिन् (७.३) | walking in the vanguard |
| जातं | जात (√जन्+क्त, २.१) | arisen |
| स्फीतं | स्फीत (√स्फाय्+क्त, २.१) | swollen |
| क्रमेण | क्रम (३.१) | gradually |
| आलिषु | आलि (७.३) | among the female friends |
| वीक्षितासु | वीक्षित (वि√ईक्ष्+क्त, ७.३) | they being seen |
| स्वाङ्गेषु | स्व–अङ्ग (७.३) | in her own limbs |
| रूपोत्थम् | रूप–उत्थ (२.१) | arisen from beauty |
| अथ | अथ | then |
| अद्भुताब्धिम् | अद्भुत–अब्धि (२.१) | the ocean of wonder |
| उद्वेलयन्तीम् | उद्वेलयन्त् (उद्√वेल्ल्+णिच्+शतृ, २.१) | causing to overflow |
| अवलोककानाम् | अवलोकक (६.३) | of the onlookers |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दा | सी | षु | ना | सी | र | च | री | षु | जा | तं |
| स्फी | तं | क्र | मे | णा | लि | षु | वी | क्षि | ता | सु |
| स्वा | ङ्गे | षु | रू | पो | त्थ | म | था | द्भु | ता | ब्धि |
| मु | द्वे | ल | य | न्ती | म | व | लो | क | का | नाम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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