तत्कालवेद्यैः शकुनस्वराद्यै-
राप्तामवाप्तां नृपतिः प्रतीत्य ।
तां लोकपालैकधुरीण एष
तस्यै सपर्यामुचितां दिदेश ॥
तत्कालवेद्यैः शकुनस्वराद्यै-
राप्तामवाप्तां नृपतिः प्रतीत्य ।
तां लोकपालैकधुरीण एष
तस्यै सपर्यामुचितां दिदेश ॥
राप्तामवाप्तां नृपतिः प्रतीत्य ।
तां लोकपालैकधुरीण एष
तस्यै सपर्यामुचितां दिदेश ॥
अन्वयः
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एषः लोकपाल-एक-धुरीणः नृपतिः, तत्काल-वेद्यैः शकुन-स्वर-आद्यैः अवाप्ताम् ताम् आप्ताम् प्रतीत्य, तस्यै उचिताम् सपर्याम् दिदेश ।
Summary
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This king (Bhima), the foremost among world-protectors, recognizing her as a trustworthy person who had arrived—a fact confirmed by timely omens and voices—ordered that proper honors be paid to her.
पदच्छेदः
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| तत्कालवेद्यैः | तत्काल–वेद्य (√विद्+यत्, ३.३) | by those knowable at that very time |
| शकुनस्वराद्यैः | शकुन–स्वर–आदि (३.३) | by omens, voices, etc. |
| आप्ताम् | आप्त (√आप्+क्त, २.१) | trustworthy |
| अवाप्तां | अवाप्त (अव√आप्+क्त, २.१) | arrived |
| नृपतिः | नृपति (१.१) | the king |
| प्रतीत्य | प्रतीत्य (प्रति√इ+ल्यप्) | having recognized |
| तां | तद् (२.१) | her |
| लोकपालैकधुरीणः | लोकपाल–एक–धुरीण (१.१) | the foremost among the world-protectors |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| तस्यै | तद् (४.१) | to her |
| सपर्याम् | सपर्या (२.१) | worship/honor |
| उचितां | उचित (√वच्+क्त, २.१) | proper |
| दिदेश | दिदेश (√दिश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | ordered |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्का | ल | वे | द्यैः | श | कु | न | स्व | रा | द्यै |
| रा | प्ता | म | वा | प्तां | नृ | प | तिः | प्र | ती | त्य |
| तां | लो | क | पा | लै | क | धु | री | ण | ए | ष |
| त | स्यै | स | प | र्या | मु | चि | तां | दि | दे | श |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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