सपल्लवं व्यासपराशराभ्यां
प्रणीतभावादुभयीभविष्णु ।
तन्मत्स्यपद्माद्युपलक्ष्यमाणं
यत्पाणियुग्मं ववृते पुराणम् ॥
सपल्लवं व्यासपराशराभ्यां
प्रणीतभावादुभयीभविष्णु ।
तन्मत्स्यपद्माद्युपलक्ष्यमाणं
यत्पाणियुग्मं ववृते पुराणम् ॥
प्रणीतभावादुभयीभविष्णु ।
तन्मत्स्यपद्माद्युपलक्ष्यमाणं
यत्पाणियुग्मं ववृते पुराणम् ॥
अन्वयः
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व्यास-पराशराभ्याम् प्रणीत-भावात् उभयी-भविष्णु, मत्स्य-पद्म-आदि-उपलक्ष्यमाणम्, स-पल्लवम् यत्-पाणि-युग्मम्, तत् पुराणम् ववृते ।
Summary
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Her pair of hands, adorned with tender fingers like sprouts and marked with auspicious signs like the fish and lotus, became the Purāṇas. This is because, like the Purāṇas which are twofold due to being composed by authors like Vyāsa and Parāśara, her hands are also a pair.
पदच्छेदः
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| सपल्लवं | सपल्लव (१.१) | with sprouts/fingers |
| व्यासपराशराभ्यां | व्यास–पराशर (३.२) | by Vyasa and Parashara |
| प्रणीतभावात् | प्रणीत (प्र√नी+क्त)–भाव (५.१) | from the state of being composed |
| उभयीभविष्णु | उभयीभविष्णु (१.१) | becoming twofold |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| मत्स्य | मत्स्य | fish |
| पद्म | पद्म | lotus |
| आदि | आदि | etc. |
| उपलक्ष्यमाणं | उपलक्ष्यमाण (उप√लक्ष्+शानच्, १.१) | being marked by |
| यत्पाणियुग्मं | यद्–पाणि–युग्म (१.१) | whose pair of hands |
| ववृते | ववृते (√वृत् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | became |
| पुराणम् | पुराण (१.१) | the Purana |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प | ल्ल | वं | व्या | स | प | रा | श | रा | भ्यां |
| प्र | णी | त | भा | वा | दु | भ | यी | भ | वि | ष्णु |
| त | न्म | त्स्य | प | द्मा | द्यु | प | ल | क्ष्य | मा | णं |
| य | त्पा | णि | यु | ग्मं | व | वृ | ते | पु | रा | णम् |
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