न्यवीविशत्तानथ राजसिंहा-
न्सिंहासनौघेषु विदर्भराजः ।
शृङ्गेषु यत्र त्रिदशैरिवैभिः
अशोभि कार्तस्वरभूधरस्य ॥
न्यवीविशत्तानथ राजसिंहा-
न्सिंहासनौघेषु विदर्भराजः ।
शृङ्गेषु यत्र त्रिदशैरिवैभिः
अशोभि कार्तस्वरभूधरस्य ॥
न्सिंहासनौघेषु विदर्भराजः ।
शृङ्गेषु यत्र त्रिदशैरिवैभिः
अशोभि कार्तस्वरभूधरस्य ॥
अन्वयः
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अथ विदर्भ-राजः तान् राज-सिंहान् सिंहासन-ओघेषु न्यवीविशत् । यत्र एभिः कार्तस्वर-भूधरस्य शृङ्गेषु त्रिदशैः इव अशोभि ।
Summary
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Then, the king of Vidarbha seated those lion-like kings upon the rows of thrones. With them seated, the assembly hall shone brightly, resembling the golden Mount Meru adorned with gods on its peaks.
पदच्छेदः
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| न्यवीविशत् | न्यवीविशत् (नि√विश् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | seated |
| तान् | तद् (२.३) | them |
| अथ | अथ | then |
| राजसिंहान् | राजन्–सिंह (२.३) | the lion-like kings |
| सिंहासनौघेषु | सिंह–आसन–ओघ (७.३) | on the multitude of thrones |
| विदर्भराजः | विदर्भ–राजन् (१.१) | the king of Vidarbha |
| शृङ्गेषु | शृङ्ग (७.३) | on the peaks |
| यत्र | यत्र | where |
| त्रिदशैः | त्रिदश (३.३) | by the gods |
| इव | इव | as if |
| एभिः | इदम् (३.३) | by these |
| अशोभि | अशोभि (√शुभ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it was shone |
| कार्तस्वरभूधरस्य | कार्तस्वर–भूधर (६.१) | of the golden mountain (Meru) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न्य | वी | वि | श | त्ता | न | थ | रा | ज | सिं | हा |
| न्सिं | हा | स | नौ | घे | षु | वि | द | र्भ | रा | जः |
| शृ | ङ्गे | षु | य | त्र | त्रि | द | शै | रि | वै | भिः |
| अ | शो | भि | का | र्त | स्व | र | भू | ध | र | स्य |
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