मुधार्पितं मूर्धसु रत्नमेभि-
र्यन्नाम तानि स्वयमेत एव ।
स्वतःप्रकाशे परमात्मबोधे
बोधान्तरं न स्फुरणाऋथमर्थ्यम् ॥
मुधार्पितं मूर्धसु रत्नमेभि-
र्यन्नाम तानि स्वयमेत एव ।
स्वतःप्रकाशे परमात्मबोधे
बोधान्तरं न स्फुरणाऋथमर्थ्यम् ॥
र्यन्नाम तानि स्वयमेत एव ।
स्वतःप्रकाशे परमात्मबोधे
बोधान्तरं न स्फुरणाऋथमर्थ्यम् ॥
अन्वयः
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एभिः मूर्धसु रत्नम् मुधा अर्पितम्, यत् नाम एते स्वयम् एव तानि (रत्नानि सन्ति) । (यथा) स्वतः-प्रकाशे परम-आत्म-बोधे स्फुरण-अर्थम् बोध-अन्तरम् न अर्थ्यम् ।
Summary
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These princes wear jewels on their heads in vain, for they themselves are the real jewels. This is analogous to the self-luminous knowledge of the Supreme Self, which requires no other source of knowledge for its own revelation.
पदच्छेदः
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| मुधा | मुधा | in vain |
| अर्पितम् | अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, १.१) | is placed |
| मूर्धसु | मूर्धन् (७.३) | on the heads |
| रत्नम् | रत्न (१.१) | a jewel |
| एभिः | इदम् (३.३) | by these |
| यत् | यद् | because |
| नाम | नाम | indeed |
| तानि | तद् (१.३) | they (the jewels) |
| स्वयम् | स्वयम् | themselves |
| एते | एतद् (१.३) | these |
| एव | एव | indeed |
| स्वतःप्रकाशे | स्वतस्–प्रकाश (७.१) | in the self-luminous |
| परमात्मबोधे | परम–आत्मन्–बोध (७.१) | in the knowledge of the Supreme Self |
| बोधान्तरम् | बोध–अन्तर (१.१) | another knowledge |
| न | न | not |
| स्फुरणार्थम् | स्फुरण–अर्थम् | for the sake of revelation |
| अर्थ्यम् | अर्थ्य (√अर्थ्+यत्, १.१) | is to be sought |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | धा | र्पि | तं | मू | र्ध | सु | र | त्न | मे | भि | |
| र्य | न्ना | म | ता | नि | स्व | य | मे | त | ए | व | |
| स्व | तः | प्र | का | शे | प | र | मा | त्म | बो | धे | |
| बो | धा | न्त | रं | न | स्फु | र | णा | ऋ | थ | म | र्थ्यम् |
| ज | त | ज | ग | ग | |||||||
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