नृपः पुरस्थैः प्रतिबद्धवर्त्मा
पश्चात्तनैः कश्चन नुद्यमानः ।
यन्त्रस्थसिद्धार्थपदाभिषेकं
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थममन्यत स्वम् ॥
नृपः पुरस्थैः प्रतिबद्धवर्त्मा
पश्चात्तनैः कश्चन नुद्यमानः ।
यन्त्रस्थसिद्धार्थपदाभिषेकं
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थममन्यत स्वम् ॥
पश्चात्तनैः कश्चन नुद्यमानः ।
यन्त्रस्थसिद्धार्थपदाभिषेकं
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थममन्यत स्वम् ॥
अन्वयः
AI
पुरस्थैः प्रतिबद्धवर्त्मा, पश्चात्तनैः नुद्यमानः कश्चन नृपः यन्त्रस्थ-सिद्धार्थ-पद-अभिषेकम् लब्ध्वा अपि स्वम् असिद्धार्थम् अमन्यत।
Summary
AI
A certain king, his path blocked by those in front and pushed by those behind, felt that even if he were to be crushed like a mustard seed in an oil-press, he would still consider himself unsuccessful in his goal.
पदच्छेदः
AI
| नृपः | नृप (१.१) | a king |
| पुरस्थैः | पुरस्थ (३.३) | by those in front |
| प्रतिबद्धवर्त्मा | प्रतिबद्ध (प्रति√बन्ध्+क्त)–वर्त्मन् (१.१) | whose path was blocked |
| पश्चात्तनैः | पश्चात्तन (३.३) | by those behind |
| कश्चन | कश्चन (१.१) | a certain |
| नुद्यमानः | नुद्यमान (√नुद्+शानच्, १.१) | being pushed |
| यन्त्रस्थ-सिद्धार्थ-पद-अभिषेकम् | यन्त्र–स्थ (√स्था)–सिद्धार्थ–पद–अभिषेक (२.१) | the anointment of a mustard seed in an oil-press |
| लब्ध्वा | लब्ध्वा (√लभ्+क्त्वा) | having obtained |
| अपि | अपि | even |
| असिद्धार्थम् | असिद्ध (√सिध्+क्त)–अर्थ (२.१) | as unsuccessful |
| अमन्यत | अमन्यत (√मन् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | considered |
| स्वम् | स्व (२.१) | himself |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नृ | पः | पु | र | स्थैः | प्र | ति | ब | द्ध | व | र्त्मा |
| प | श्चा | त्त | नैः | क | श्च | न | नु | द्य | मा | नः |
| य | न्त्र | स्थ | सि | द्धा | र्थ | प | दा | भि | षे | कं |
| ल | ब्ध्वा | प्य | सि | द्धा | र्थ | म | म | न्य | त | स्वम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.