नाकेऽपि दीव्यत्तमदिव्यवाचि
वचःस्रगाचार्यकवित्कविर्यः ।
दैतेयनीतेः पथि सार्थवाहः
काव्यः स काव्येन सभामभाणीत् ॥
नाकेऽपि दीव्यत्तमदिव्यवाचि
वचःस्रगाचार्यकवित्कविर्यः ।
दैतेयनीतेः पथि सार्थवाहः
काव्यः स काव्येन सभामभाणीत् ॥
वचःस्रगाचार्यकवित्कविर्यः ।
दैतेयनीतेः पथि सार्थवाहः
काव्यः स काव्येन सभामभाणीत् ॥
अन्वयः
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यः नाके अपि दीव्यत्-तम-दिव्य-वाचि, वचः-स्रक्-आचार्यक-वित् कविः, दैतेय-नीतेः पथि सार्थवाहः (अस्ति), सः काव्यः काव्येन सभाम् अभाणीत् ।
Summary
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That Kavya (Shukracharya), who is a poet skilled in composing garlands of words, a leader on the path of the Daityas' policy, and whose divine speech is the most brilliant even in heaven, addressed the assembly with his poetry.
पदच्छेदः
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| नाके | नाक (७.१) | in heaven |
| अपि | अपि | even |
| दीव्यत्तमदिव्यवाचि | दीव्यत्–तम–दिव्य–वाच् (७.१) | in the most brilliant divine speech |
| वचःस्रगाचार्यकवित् | वचस्–स्रज्–आचार्यक–विद् (१.१) | one who knows the art of composing garlands of words |
| कविः | कवि (१.१) | poet |
| यः | यद् (१.१) | who |
| दैतेयनीतेः | दैतेय–नीति (६.१) | of the policy of the Daityas |
| पथि | पथिन् (७.१) | on the path |
| सार्थवाहः | सार्थवाह (१.१) | a caravan leader |
| काव्यः | काव्य (१.१) | Kavya (Shukracharya) |
| सः | तद् (१.१) | he |
| काव्येन | काव्य (३.१) | with poetry |
| सभाम् | सभा (२.१) | the assembly |
| अभाणीत् | अभाणीत् (√भण् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | addressed |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | के | ऽपि | दी | व्य | त्त | म | दि | व्य | वा | चि |
| व | चः | स्र | गा | चा | र्य | क | वि | त्क | वि | र्यः |
| दै | ते | य | नी | तेः | प | थि | सा | र्थ | वा | हः |
| का | व्यः | स | का | व्ये | न | स | भा | म | भा | णीत् |
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