प्रदक्षिणं दैवतहर्म्यमद्रिं
सदैव कुर्वन्नपि शर्वरीशः ।
द्रष्टा महेन्द्रानुजदृष्टिमूर्त्या
न प्राप तद्दर्शनविघ्नतापम् ॥
प्रदक्षिणं दैवतहर्म्यमद्रिं
सदैव कुर्वन्नपि शर्वरीशः ।
द्रष्टा महेन्द्रानुजदृष्टिमूर्त्या
न प्राप तद्दर्शनविघ्नतापम् ॥
सदैव कुर्वन्नपि शर्वरीशः ।
द्रष्टा महेन्द्रानुजदृष्टिमूर्त्या
न प्राप तद्दर्शनविघ्नतापम् ॥
अन्वयः
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शर्वरी-ईशः सदा एव दैवत-हर्म्यम् अद्रिम् प्रदक्षिणम् कुर्वन् अपि, महेन्द्र-अनुज-दृष्टि-मूर्त्या द्रष्टा (सन्) तत्-दर्शन-विघ्न-तापम् न प्राप ।
Summary
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The lord of the night (the Moon), though always circumambulating the mountain Meru, the palace of the gods, did not suffer the pain of having his view obstructed, because he was watching through the form of Vishnu's (Mahendra's younger brother's) eyes.
पदच्छेदः
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| प्रदक्षिणम् | प्रदक्षिणम् (२.१) | circumambulation |
| दैवतहर्म्यम् | दैवत–हर्म्य (२.१) | the palace of the gods |
| अद्रिम् | अद्रि (२.१) | the mountain (Meru) |
| सदा | सदा | always |
| एव | एव | indeed |
| कुर्वन् | कुर्वत् (√कृ+शतृ, १.१) | doing |
| अपि | अपि | even though |
| शर्वरीशः | शर्वरी–ईश (१.१) | the lord of the night (Moon) |
| द्रष्टा | द्रष्टृ (१.१) | as a seer |
| महेन्द्रानुजदृष्टिमूर्त्या | महेन्द्र–अनुज–दृष्टि–मूर्ति (३.१) | through the form of the eyes of Vishnu |
| न | न | not |
| प्राप | प्राप (प्र√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| तद्दर्शनविघ्नतापम् | तद्–दर्शन–विघ्न–ताप (२.१) | the pain of obstruction to viewing |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | द | क्षि | णं | दै | व | त | ह | र्म्य | म | द्रिं |
| स | दै | व | कु | र्व | न्न | पि | श | र्व | री | शः |
| द्र | ष्टा | म | हे | न्द्रा | नु | ज | दृ | ष्टि | मू | र्त्या |
| न | प्रा | प | त | द्द | र्श | न | वि | घ्न | ता | पम् |
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