मायानलोदाहरणान्मिथस्तै-
रूचे समाः सन्त्यमुना कियन्तः ।
आत्मापकर्षे सति मत्सराणां
द्विषः परस्पर्धनया समाधिः ॥
मायानलोदाहरणान्मिथस्तै-
रूचे समाः सन्त्यमुना कियन्तः ।
आत्मापकर्षे सति मत्सराणां
द्विषः परस्पर्धनया समाधिः ॥
रूचे समाः सन्त्यमुना कियन्तः ।
आत्मापकर्षे सति मत्सराणां
द्विषः परस्पर्धनया समाधिः ॥
अन्वयः
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तैः मिथः ऊचे - “अमुना समाः कियन्तः माया-नल-उदाहरणान् सन्ति?” । मत्सराणाम् आत्म-अपकर्षे सति द्विषः पर-स्पर्धनया समाधिः (भवति) ।
Summary
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They said among themselves, "How many are there equal to him, citing the examples of illusory Nalas?" When their own excellence is diminished, the envious find solace by imagining rivals for their enemy.
पदच्छेदः
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| मायानलोदाहरणान् | माया–नल–उदाहरण (२.३) | examples of illusory Nalas |
| मिथः | मिथस् | among themselves |
| तैः | तद् (३.३) | by them |
| ऊचे | ऊचे (√वच् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it was said |
| समाः | सम (१.३) | equal |
| सन्ति | सन्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are |
| अमुना | अदस् (३.१) | to him |
| कियन्तः | कियन्त् (१.३) | how many |
| आत्मापकर्षे | आत्मन्–अपकर्ष (७.१) | when there is a decline of self |
| सति | सत् (√अस्+शतृ, ७.१) | being |
| मत्सराणाम् | मत्सर (६.३) | of the envious |
| द्विषः | द्विष् (६.१) | of an enemy |
| परस्पर्धनया | पर–स्पर्धना (३.१) | by rivalry with another |
| समाधिः | समाधि (१.१) | solace |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | या | न | लो | दा | ह | र | णा | न्मि | थ | स्तै |
| रू | चे | स | माः | स | न्त्य | मु | ना | कि | य | न्तः |
| आ | त्मा | प | क | र्षे | स | ति | म | त्स | रा | णां |
| द्वि | षः | प | र | स्प | र्ध | न | या | स | मा | धिः |
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