धृताङ्गरागे कलितद्युशोभां
तस्मिन्सभां चुम्बति राजचन्द्रे ।
गता बताक्ष्णोर्विषयं विहाय
क्व क्षात्त्रनक्षत्त्रकुलस्य कान्तिः ॥
धृताङ्गरागे कलितद्युशोभां
तस्मिन्सभां चुम्बति राजचन्द्रे ।
गता बताक्ष्णोर्विषयं विहाय
क्व क्षात्त्रनक्षत्त्रकुलस्य कान्तिः ॥
तस्मिन्सभां चुम्बति राजचन्द्रे ।
गता बताक्ष्णोर्विषयं विहाय
क्व क्षात्त्रनक्षत्त्रकुलस्य कान्तिः ॥
अन्वयः
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बत तस्मिन् धृताङ्गरागे राजचन्द्रे कलितद्युशोभाम् सभाम् चुम्बति (सति), क्षात्त्रनक्षत्रकुलस्य कान्तिः अक्ष्णोः विषयम् विहाय क्व गता?
Summary
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Alas, when that moon among kings (Nala), who had applied unguents, graced the assembly which possessed radiant beauty, where did the brilliance of the host of Kshatriya-stars go, having vanished from the range of sight?
पदच्छेदः
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| धृताङ्गरागे | धृत (√धृ+क्त)–अङ्गराग (७.१) | on him who had applied unguents |
| कलितद्युशोभाम् | कलित (√कल्+क्त)–द्यु–शोभा (२.१) | which possessed radiant beauty |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | on that |
| सभाम् | सभा (२.१) | the assembly |
| चुम्बति | चुम्बत् (√चुम्ब्, ७.१) | touching/gracing |
| राजचन्द्रे | राजन्–चन्द्र (७.१) | on the moon among kings (Nala) |
| गता | गत (√गम्+क्त, १.१) | gone |
| बत | बत | alas |
| अक्ष्णोः | अक्षि (६.२) | of the two eyes |
| विषयम् | विषय (२.१) | the range |
| विहाय | विहाय (वि√हा+ल्यप्) | having left |
| क्व | क्व | where |
| क्षात्त्रनक्षत्रकुलस्य | क्षात्त्र–नक्षत्र–कुल (६.१) | of the host of Kshatriya-stars |
| कान्तिः | कान्ति (१.१) | the brilliance |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धृ | ता | ङ्ग | रा | गे | क | लि | त | द्यु | शो | भां |
| त | स्मि | न्स | भां | चु | म्ब | ति | रा | ज | च | न्द्रे |
| ग | ता | ब | ता | क्ष्णो | र्वि | ष | यं | वि | हा | य |
| क्व | क्षा | त्त्र | न | क्ष | त्त्र | कु | ल | स्य | का | न्तिः |
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