भूषाभिरुच्चैरपि संस्कृते यं
वीक्ष्याकृत प्राकृतबुद्धिमेव ।
प्रसूनबाणे विबुधाधिनाथ-
स्तेनाथ साऽशोभि सभा नलेन ॥
भूषाभिरुच्चैरपि संस्कृते यं
वीक्ष्याकृत प्राकृतबुद्धिमेव ।
प्रसूनबाणे विबुधाधिनाथ-
स्तेनाथ साऽशोभि सभा नलेन ॥
वीक्ष्याकृत प्राकृतबुद्धिमेव ।
प्रसूनबाणे विबुधाधिनाथ-
स्तेनाथ साऽशोभि सभा नलेन ॥
अन्वयः
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अथ विबुधाधिनाथः उच्चैः भूषाभिः संस्कृते अपि यम् वीक्ष्य प्राकृतबुद्धिम् एव अकृत, तेन नलेन सा सभा प्रसूनबाणे (सति) अशोभि ।
Summary
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Then, the lord of the gods (Indra), upon seeing Nala, considered even the flower-arrowed one (Kamadeva) as ordinary, though Kamadeva was adorned with lofty ornaments. By that very Nala, the entire assembly was made beautiful.
पदच्छेदः
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| भूषाभिः | भूषा (३.३) | with ornaments |
| उच्चैः | उच्चैस् | lofty |
| अपि | अपि | even |
| संस्कृते | संस्कृत (सम्√कृ+क्त, ७.१) | on the adorned one |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| अकृत | अकृत (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made/considered |
| प्राकृतबुद्धिम् | प्राकृत–बुद्धि (२.१) | as of ordinary intellect |
| एव | एव | only |
| प्रसूनबाणे | प्रसून–बाण (७.१) | in the flower-arrowed one (Kamadeva) |
| विबुधाधिनाथः | विबुध–अधिनाथ (१.१) | the lord of the gods (Indra) |
| तेन | तद् (३.१) | by that |
| अथ | अथ | then |
| सा | तद् (१.१) | that |
| अशोभि | अशोभि (√शुभ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was adorned |
| सभा | सभा (१.१) | assembly |
| नलेन | नल (३.१) | by Nala |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | षा | भि | रु | च्चै | र | पि | सं | स्कृ | ते | यं |
| वी | क्ष्या | कृ | त | प्रा | कृ | त | बु | द्धि | मे | व |
| प्र | सू | न | बा | णे | वि | बु | धा | धि | ना | थ |
| स्ते | ना | थ | सा | ऽशो | भि | स | भा | न | ले | न |
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