पुरे पथि द्वारगृहाणि तत्र
चित्रीकृतान्युत्सववाञ्छयेव ।
नभोऽपि किर्मीरमकारि तेषां
महीभुजामाभरणप्रभाभिः ॥
पुरे पथि द्वारगृहाणि तत्र
चित्रीकृतान्युत्सववाञ्छयेव ।
नभोऽपि किर्मीरमकारि तेषां
महीभुजामाभरणप्रभाभिः ॥
चित्रीकृतान्युत्सववाञ्छयेव ।
नभोऽपि किर्मीरमकारि तेषां
महीभुजामाभरणप्रभाभिः ॥
अन्वयः
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तत्र पुरे पथि द्वार-गृहाणि उत्सव-वाञ्छया इव चित्रीकृतानि । तेषाम् महीभुजाम् आभरण-प्रभाभिः नभः अपि किर्मीरम् अकारि ।
Summary
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There, in the city, the houses along the gates and paths were decorated as if out of a desire for festivity. The sky itself was made variegated by the splendor of the ornaments worn by those kings.
पदच्छेदः
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| पुरे | पुर (७.१) | in the city |
| पथि | पथिन् (७.१) | on the path |
| द्वारगृहाणि | द्वार–गृह (१.३) | the houses at the gates |
| तत्र | तत्र | there |
| चित्रीकृतानि | चित्रीकृत (√चित्री-कृ+क्त, १.३) | were decorated |
| उत्सववाञ्छयेव | उत्सव–वाञ्छा (३.१)–इव | as if with a desire for festivity |
| नभः | नभस् (१.१) | the sky |
| अपि | अपि | also |
| किर्मीरम् | किर्मीर (२.१) | variegated |
| अकारि | अकारि (√कृ भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was made |
| तेषाम् | तद् (६.३) | of those |
| महीभुजाम् | महीभुज् (६.३) | kings |
| आभरणप्रभाभिः | आभरण–प्रभा (३.३) | by the splendor of their ornaments |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रे | प | थि | द्वा | र | गृ | हा | णि | त | त्र |
| चि | त्री | कृ | ता | न्यु | त्स | व | वा | ञ्छ | ये | व |
| न | भो | ऽपि | कि | र्मी | र | म | का | रि | ते | षां |
| म | ही | भु | जा | मा | भ | र | ण | प्र | भा | भिः |
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