योग्यैर्व्रजद्भिर्नृपजां वरीतुं
वीरैरनर्हैः प्रसभेन हर्तुम् ।
द्रष्टुं परैस्तान्परिकर्तुमन्यैः
स्वमात्रशेषाः ककुभो बभूवुः ॥
योग्यैर्व्रजद्भिर्नृपजां वरीतुं
वीरैरनर्हैः प्रसभेन हर्तुम् ।
द्रष्टुं परैस्तान्परिकर्तुमन्यैः
स्वमात्रशेषाः ककुभो बभूवुः ॥
वीरैरनर्हैः प्रसभेन हर्तुम् ।
द्रष्टुं परैस्तान्परिकर्तुमन्यैः
स्वमात्रशेषाः ककुभो बभूवुः ॥
अन्वयः
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योग्यैः नृपजाम् वरीतुम्, अनर्हैः वीरैः प्रसभेन हर्तुम्, परैः द्रष्टुम्, अन्यैः तान् परिकर्तुम् व्रजद्भिः (जनैः), ककुभः स्वमात्रशेषाः बभूवुः।
Summary
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With the worthy going to woo the princess, the unworthy heroes to abduct her by force, others to watch, and still others to surround them, the directions became so filled with people that only space itself remained.
पदच्छेदः
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| योग्यैः | योग्य (३.३) | by the worthy ones |
| व्रजद्भिः | व्रजत् (√व्रज्+शतृ, ३.३) | by those going |
| नृपजाम् | नृपजा (२.१) | the princess |
| वरीतुम् | वरीतुम् (√वृ+तुमुन्) | to choose |
| वीरैः | वीर (३.३) | by the heroes |
| अनर्हैः | अनर्ह (३.३) | unworthy |
| प्रसभेन | प्रसभ (३.१) | by force |
| हर्तुम् | हर्तुम् (√हृ+तुमुन्) | to abduct |
| द्रष्टुम् | द्रष्टुम् (√दृश्+तुमुन्) | to see |
| परैः | पर (३.३) | by others |
| तान् | तद् (२.३) | them |
| परिकर्तुम् | परिकर्तुम् (परि√कृ+तुमुन्) | to surround |
| अन्यैः | अन्य (३.३) | by others |
| स्वमात्रशेषाः | स्व–मात्र–शेष (१.३) | left with only themselves |
| ककुभः | ककुभ् (१.३) | the directions |
| बभूवुः | बभूवुः (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | became |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यो | ग्यै | र्व्र | ज | द्भि | र्नृ | प | जां | व | री | तुं |
| वी | रै | र | न | र्हैः | प्र | स | भे | न | ह | र्तुम् |
| द्र | ष्टुं | प | रै | स्ता | न्प | रि | क | र्तु | म | न्यैः |
| स्व | मा | त्र | शे | षाः | क | कु | भो | ब | भू | वुः |
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