स्वं नैषधादेशमहो विधाय
कार्यस्य हेतोरपि नानलः सन् ।
किं स्थानिवद्भावमधत्त दुष्टं
तादृक्कृतव्याकरणः पुनः सः ॥
स्वं नैषधादेशमहो विधाय
कार्यस्य हेतोरपि नानलः सन् ।
किं स्थानिवद्भावमधत्त दुष्टं
तादृक्कृतव्याकरणः पुनः सः ॥
कार्यस्य हेतोरपि नानलः सन् ।
किं स्थानिवद्भावमधत्त दुष्टं
तादृक्कृतव्याकरणः पुनः सः ॥
अन्वयः
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अहो, सः (इन्द्रः) कार्यस्य हेतोः अपि स्वम् नैषध-आदेशम् विधाय, अनलः न सन्, तादृक्-कृत-व्याकरणः (सन्) पुनः दुष्टम् स्थानिवत्-भावम् किम् अधत्त?
Summary
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(Nala thinks:) 'Oh! For the sake of his mission, this person has substituted himself for me. But, not being Agni (and thus not subject to the grammatical rule 'analvidhau'), why has he, who has performed such a grammatical operation, assumed this faulty imitation of the original (sthānivadbhāva)?'
पदच्छेदः
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| स्वम् | स्व (२.१) | his own |
| नैषध-आदेशम् | नैषध–आदेश (२.१) | the substitution of 'Naishadha' |
| अहो | अहो | Oh! |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having made |
| कार्यस्य | कार्य (६.१) | of the task |
| हेतोः | हेतु (५.१) | for the reason |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| अनलः | अनल (१.१) | Agni (fire) |
| सन् | सत् (√अस्+शतृ, १.१) | being |
| किम् | किम् | why |
| स्थानिवत्-भावम् | स्थानिवत्–भाव (२.१) | the state of being like the original |
| अधत्त | अधत्त (√धा कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | assumed |
| दुष्टम् | दुष्ट (२.१) | faulty |
| तादृक्-कृत-व्याकरणः | तादृक्–कृत–व्याकरण (१.१) | he who has thus performed a grammatical operation |
| पुनः | पुनर् | again |
| सः | तद् (१.१) | he |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वं | नै | ष | धा | दे | श | म | हो | वि | धा | य |
| का | र्य | स्य | हे | तो | र | पि | ना | न | लः | सन् |
| किं | स्था | नि | व | द्भा | व | म | ध | त्त | दु | ष्टं |
| ता | दृ | क्कृ | त | व्या | क | र | णः | पु | नः | सः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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