इति स्तुवानः सविधे नलेन
विलोकितः शङ्कितमानसेन ।
व्याकृत्य मर्त्योचितमर्थमुक्ते-
राखण्डलस्तस्य नुनोद शङ्काम् ॥
इति स्तुवानः सविधे नलेन
विलोकितः शङ्कितमानसेन ।
व्याकृत्य मर्त्योचितमर्थमुक्ते-
राखण्डलस्तस्य नुनोद शङ्काम् ॥
विलोकितः शङ्कितमानसेन ।
व्याकृत्य मर्त्योचितमर्थमुक्ते-
राखण्डलस्तस्य नुनोद शङ्काम् ॥
अन्वयः
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इति स्तुवानः आखण्डलः सविधे शङ्कित-मानसेन नलेन विलोकितः (सन्), उक्तेः मर्त्य-उचितम् अर्थम् व्याकृत्य तस्य शङ्काम् नुनोद।
Summary
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As he was thus praising, Indra was observed by the nearby Nala, whose mind had grown suspicious. Noticing this, Indra dispelled Nala's doubt by reinterpreting his words with a meaning appropriate for a mortal to have spoken.
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| स्तुवानः | स्तुवान (√स्तु+शानच्, १.१) | praising |
| सविधे | सविधे | nearby |
| नलेन | नल (३.१) | by Nala |
| विलोकितः | विलोकित (वि√लोक्+क्त, १.१) | seen |
| शङ्कित-मानसेन | शङ्कित–मानस (३.१) | by him whose mind was suspicious |
| व्याकृत्य | व्याकृत्य (वि+आ√कृ+ल्यप्) | having explained |
| मर्त्य-उचितम् | मर्त्य–उचित (२.१) | suitable for a mortal |
| अर्थम् | अर्थ (२.१) | meaning |
| उक्तेः | उक्ति (६.१) | of the speech |
| आखण्डलः | आखण्डल (१.१) | Indra |
| तस्य | तद् (६.१) | his (Nala's) |
| नुनोद | नुनोद (√नुद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | dispelled |
| शङ्काम् | शङ्का (२.१) | doubt |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | स्तु | वा | नः | स | वि | धे | न | ले | न |
| वि | लो | कि | तः | श | ङ्कि | त | मा | न | से | न |
| व्या | कृ | त्य | म | र्त्यो | चि | त | म | र्थ | मु | क्ते |
| रा | ख | ण्ड | ल | स्त | स्य | नु | नो | द | श | ङ्काम् |
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