कृतिः स्मरस्यैव न धातुरेषा
नास्या हि शिल्पीतरकारुजेयः ।
रूपस्य शिल्पे वयसाऽपि वेधा
निजीयते स स्मरकिङ्करेण ॥
कृतिः स्मरस्यैव न धातुरेषा
नास्या हि शिल्पीतरकारुजेयः ।
रूपस्य शिल्पे वयसाऽपि वेधा
निजीयते स स्मरकिङ्करेण ॥
नास्या हि शिल्पीतरकारुजेयः ।
रूपस्य शिल्पे वयसाऽपि वेधा
निजीयते स स्मरकिङ्करेण ॥
अन्वयः
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एषा स्मरस्य एव कृतिः, न धातुः (कृतिः)। हि (एषा) शिल्पि-इतर-कारु-जेया न (अस्ति)। रूपस्य शिल्पे सः वेधाः स्मर-किङ्करेण वयसा अपि निजीयते।
Summary
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This is a creation of Kama alone, not of the Creator Brahma. Indeed, she cannot be surpassed by any artisan other than that master craftsman (Kama). In the art of creating beauty, even the Creator Brahma is defeated by Kama's servant, Youth.
पदच्छेदः
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| कृतिः | कृति (१.१) | creation |
| स्मरस्य | स्मर (६.१) | of Kama |
| एव | एव | only |
| न | न | not |
| धातुः | धातृ (६.१) | of the Creator |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| न | न | not |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| हि | हि | because |
| शिल्पि-इतर-कारु-जेयः | शिल्पिन्–इतर–कारु–जेय (१.१) | conquerable by any artisan other than the craftsman |
| रूपस्य | रूप (६.१) | of beauty |
| शिल्पे | शिल्प (७.१) | in the art |
| वयसा | वयस् (३.१) | by youth |
| अपि | अपि | even |
| वेधाः | वेधस् (१.१) | the Creator (Brahma) |
| निजीयते | निजीयते (नि√जि भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is defeated |
| सः | तद् (१.१) | he |
| स्मर-किङ्करेण | स्मर–किङ्कर (३.१) | by the servant of Kama |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | तिः | स्म | र | स्यै | व | न | धा | तु | रे | षा |
| ना | स्या | हि | शि | ल्पी | त | र | का | रु | जे | यः |
| रू | प | स्य | शि | ल्पे | व | य | सा | ऽपि | वे | धा |
| नि | जी | य | ते | स | स्म | र | कि | ङ्क | रे | ण |
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