निजामृतोद्यन्नवनीतजाङ्गी-
मेतां क्रमोन्मीलितपीतिमानम् ।
कृत्वेन्दुरस्या मुखमात्मनाभू-
न्निद्रालुना दुर्घटमम्बुजेन ॥
निजामृतोद्यन्नवनीतजाङ्गी-
मेतां क्रमोन्मीलितपीतिमानम् ।
कृत्वेन्दुरस्या मुखमात्मनाभू-
न्निद्रालुना दुर्घटमम्बुजेन ॥
मेतां क्रमोन्मीलितपीतिमानम् ।
कृत्वेन्दुरस्या मुखमात्मनाभू-
न्निद्रालुना दुर्घटमम्बुजेन ॥
अन्वयः
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इन्दुः एताम् निजामृत-उद्यत्-नवनीत-जा-अङ्गीम् क्रमोन्मीलित-पीतिमानम् च कृत्वा, आत्मना अस्याः मुखम् अभूत्। (इदम् कार्यम्) निद्रालुना अम्बुजेन दुर्घटम् (आसीत्)।
Summary
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Having fashioned this lady, whose limbs are born of fresh butter churned from his own nectar and in whom a golden hue gradually appeared, the Moon himself became her face—a feat impossible for the sleepy lotus to accomplish.
पदच्छेदः
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| निज-अमृत-उद्यत्-नवनीत-जा-अङ्गीम् | निज–अमृत–उद्यत्–नवनीत–ज–अङ्गी (२.१) | her, whose limbs are made of fresh butter from his own rising nectar |
| एताम् | एतद् (२.१) | this one |
| क्रम-उन्मीलित-पीतिमानम् | क्रम–उन्मीलित–पीतिमन् (२.१) | in whom a golden hue gradually manifested |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having made |
| इन्दुः | इन्दु (१.१) | the Moon |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| मुखम् | मुख (२.१) | face |
| आत्मना | आत्मन् (३.१) | by himself |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| निद्रालुना | निद्रालु (३.१) | by the sleepy |
| दुर्घटम् | दुर्घट (२.१) | difficult to achieve |
| अम्बुजेन | अम्बुज (३.१) | by the lotus |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | जा | मृ | तो | द्य | न्न | व | नी | त | जा | ङ्गी |
| मे | तां | क्र | मो | न्मी | लि | त | पी | ति | मा | नम् |
| कृ | त्वे | न्दु | र | स्या | मु | ख | मा | त्म | ना | भू |
| न्नि | द्रा | लु | ना | दु | र्घ | ट | म | म्बु | जे | न |
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