इमां न मृद्वीमसृजत्कराभ्यां
वेधा कुशाध्यासनकर्कशाभ्याम् ।
शृङ्गारधारां मनसा न शान्ति-
विश्रान्तिधन्वाध्वमहीरुहेण ॥
इमां न मृद्वीमसृजत्कराभ्यां
वेधा कुशाध्यासनकर्कशाभ्याम् ।
शृङ्गारधारां मनसा न शान्ति-
विश्रान्तिधन्वाध्वमहीरुहेण ॥
वेधा कुशाध्यासनकर्कशाभ्याम् ।
शृङ्गारधारां मनसा न शान्ति-
विश्रान्तिधन्वाध्वमहीरुहेण ॥
अन्वयः
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वेधाः मृद्वीम् इमाम् कुश-अध्यासन-कर्कशाभ्याम् कराभ्याम् न असृजत्। (तथा) शृङ्गार-धाराम् (इमाम्) शान्ति-विश्रान्ति-धन्व-अध्व-महीरुहेण मनसा न (असृजत्)।
Summary
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The Creator did not fashion this soft lady with his hands, made rough from sitting on Kusha grass. Nor did he create this embodiment of passion with his mind, which is like a tree on the desert path of tranquility and repose.
पदच्छेदः
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| इमाम् | इदम् (२.१) | this |
| न | न | not |
| मृद्वीम् | मृद्वी (२.१) | soft one |
| असृजत् | असृजत् (√सृज् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | created |
| कराभ्याम् | कर (३.२) | with his two hands |
| वेधाः | वेधस् (१.१) | the Creator |
| कुश-अध्यासन-कर्कशाभ्याम् | कुश–अध्यासन–कर्कश (३.२) | which are rough from sitting on Kusha grass |
| शृङ्गार-धाराम् | शृङ्गार–धारा (२.१) | a stream of passion |
| मनसा | मनस् (३.१) | with his mind |
| न | न | not |
| शान्ति-विश्रान्ति-धन्व-अध्व-महीरुहेण | शान्ति–विश्रान्ति–धन्वन्–अध्वन्–महीरुह (३.१) | which is a tree on the desert path of peace and repose |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | मां | न | मृ | द्वी | म | सृ | ज | त्क | रा | भ्यां |
| वे | धा | कु | शा | ध्या | स | न | क | र्क | शा | भ्याम् |
| शृ | ङ्गा | र | धा | रां | म | न | सा | न | शा | न्ति |
| वि | श्रा | न्ति | ध | न्वा | ध्व | म | ही | रु | हे | ण |
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