तनोत्यकीर्तिं कुसुमाशुगस्य
सैषा बतेन्दीवरकर्णपूरौ ।
यतः श्रवःकुण्डलिकापराद्ध-
शरं खलः ख्यापयिता तमाभ्याम् ॥
तनोत्यकीर्तिं कुसुमाशुगस्य
सैषा बतेन्दीवरकर्णपूरौ ।
यतः श्रवःकुण्डलिकापराद्ध-
शरं खलः ख्यापयिता तमाभ्याम् ॥
सैषा बतेन्दीवरकर्णपूरौ ।
यतः श्रवःकुण्डलिकापराद्ध-
शरं खलः ख्यापयिता तमाभ्याम् ॥
अन्वयः
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बत सा एषा इन्दीवर कर्णपूरौ (धृत्वा) कुसुम आशुगस्य अकीर्तिम् तनोति । यतः खलः (कामः) आभ्याम् श्रवः कुण्डलिका अपराद्ध शरम् तम् ख्यापयिता ।
Summary
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"Alas, by wearing these two blue lotuses as ear ornaments, she spreads the disrepute of Kamadeva. Because of these, that rogue will be proclaimed as one whose arrows have missed their mark and struck her ear-rings instead."
पदच्छेदः
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| तनोति | तनोति (√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spreads |
| अकीर्तिम् | अकीर्ति (२.१) | disrepute |
| कुसुमाशुगस्य | कुसुम–आशुग (६.१) | of the flower-arrowed one (Kamadeva) |
| सा | तद् (१.१) | she |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| बत | बत | alas |
| इन्दीवरकर्णपूरौ | इन्दीवर–कर्णपूर (१.२) | the two blue lotus ear-ornaments |
| यतः | यतः | because |
| श्रवःकुण्डलिकापराद्धशरम् | श्रवस्–कुण्डलिका–अपराद्ध (अप√रध्+क्त)–शर (२.१) | as one whose arrows missed the ear-rings |
| खलः | खल (१.१) | a rogue |
| ख्यापयिता | ख्यापयिता (√ख्या +णिच् कर्तरि लुट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will proclaim |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| आभ्याम् | इदम् (३.२) | by these two |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | नो | त्य | की | र्तिं | कु | सु | मा | शु | ग | स्य |
| सै | षा | ब | ते | न्दी | व | र | क | र्ण | पू | रौ |
| य | तः | श्र | वः | कु | ण्ड | लि | का | प | रा | द्ध |
| श | रं | ख | लः | ख्या | प | यि | ता | त | मा | भ्याम् |
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