लक्ष्ये धृतं कुण्डलिके सुदत्या
ताटङ्कयुग्मं स्मरधन्विने किम् ।
सव्यापसव्यं विशिखा विसृष्टा-
स्तेनानयोर्यान्ति किमन्तरेव ॥
लक्ष्ये धृतं कुण्डलिके सुदत्या
ताटङ्कयुग्मं स्मरधन्विने किम् ।
सव्यापसव्यं विशिखा विसृष्टा-
स्तेनानयोर्यान्ति किमन्तरेव ॥
ताटङ्कयुग्मं स्मरधन्विने किम् ।
सव्यापसव्यं विशिखा विसृष्टा-
स्तेनानयोर्यान्ति किमन्तरेव ॥
अन्वयः
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सुदत्याः ताटङ्क युग्मम् स्मर धन्विने लक्ष्ये धृतम् किम्? तेन सव्य अपसव्यम् विसृष्टाः विशिखाः अनयोः अन्तरे एव यान्ति किम्?
Summary
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"Has this beautiful-toothed lady's pair of ear-ornaments been held as a target for the archer Kamadeva? Is it that the arrows he shoots, left and right, travel only between these two (earrings, passing through the hearts of onlookers)?"
पदच्छेदः
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| लक्ष्ये | लक्ष्य (७.१) | as a target |
| धृतम् | धृत (√धृ+क्त, १.१) | held |
| कुण्डलिके | कुण्डलिका (१.२) | the two ear-rings |
| सुदत्याः | सुदती (६.१) | of the one with beautiful teeth |
| ताटङ्कयुग्मम् | ताटङ्क–युग्म (१.१) | the pair of ear ornaments |
| स्मरधन्विने | स्मर–धन्विन् (४.१) | for the archer Smara (Kamadeva) |
| किम् | किम् | is it that? |
| सव्यापसव्यम् | सव्य–अपसव्यम् | left and right |
| विशिखाः | विशिख (१.३) | arrows |
| विसृष्टाः | विसृष्ट (वि√सृज्+क्त, १.३) | shot |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| अनयोः | इदम् (६.२) | of these two |
| यान्ति | यान्ति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | go |
| किम् | किम् | is it that? |
| अन्तरे | अन्तर (७.१) | between |
| एव | एव | only |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ल | क्ष्ये | धृ | तं | कु | ण्ड | लि | के | सु | द | त्या |
| ता | ट | ङ्क | यु | ग्मं | स्म | र | ध | न्वि | ने | किम् |
| स | व्या | प | स | व्यं | वि | शि | खा | वि | सृ | ष्टा |
| स्ते | ना | न | यो | र्या | न्ति | कि | म | न्त | रे | व |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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