रम्भादिलोभात्कृतकर्मभिर्मा
शून्यैव भूर्भूत्सुरभूमिपान्थैः ।
इत्येतयालोपि दिवोऽपि पुंसां
वैमत्यमत्यप्सरसा रसायाम् ॥
रम्भादिलोभात्कृतकर्मभिर्मा
शून्यैव भूर्भूत्सुरभूमिपान्थैः ।
इत्येतयालोपि दिवोऽपि पुंसां
वैमत्यमत्यप्सरसा रसायाम् ॥
शून्यैव भूर्भूत्सुरभूमिपान्थैः ।
इत्येतयालोपि दिवोऽपि पुंसां
वैमत्यमत्यप्सरसा रसायाम् ॥
अन्वयः
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"रम्भा आदि लोभात् कृत कर्मभिः सुर भूमि पान्थैः भूः शून्या एव मा भूत्" इति (विचार्य) रसायाम् अति अप्सरसा एतया दिवः अपि पुंसाम् वैमत्यम् आलोपि ।
Summary
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By her presence on earth, this lady, who surpasses the Apsaras, has erased any preference men might have for heaven. They now think, "Let not the earth become empty of those who, desiring Rambha and other celestial nymphs, perform sacrifices to travel to the land of the gods."
पदच्छेदः
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| रम्भादिलोभात् | रम्भा–आदि–लोभ (५.१) | due to desire for Rambha and others |
| कृतकर्मभिः | कृत (√कृ+क्त)–कर्मन् (३.३) | by those who have performed deeds |
| मा | मा | let not |
| शून्या | शून्य (१.१) | empty |
| एव | एव | indeed |
| भूः | भू (१.१) | the earth |
| भूत् | भूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | become |
| सुरभूमिपान्थैः | सुर–भूमि–पान्थ (३.३) | by the travelers to the land of gods |
| इति | इति | thus |
| एतया | एतद् (३.१) | by this one |
| आलोपि | आलोपि (आ√लुप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was erased |
| दिवः | दिव् (६.१) | of heaven |
| अपि | अपि | even |
| पुंसाम् | पुंस् (६.३) | of men |
| वैमत्यम् | वैमत्य (१.१) | preference |
| अत्यप्सरसा | अति–अप्सरस् (३.१) | by one surpassing the Apsaras |
| रसायाम् | रसा (७.१) | on the earth |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | म्भा | दि | लो | भा | त्कृ | त | क | र्म | भि | र्मा |
| शू | न्यै | व | भू | र्भू | त्सु | र | भू | मि | पा | न्थैः |
| इ | त्ये | त | या | लो | पि | दि | वो | ऽपि | पुं | सां |
| वै | म | त्य | म | त्य | प्स | र | सा | र | सा | याम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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