मन्त्रैः पुरं भीमपुरोहितस्य
तद्बद्धरक्षं विशति क्व रक्षः ।
तत्रोद्यमं दिक्पतिराततान
यातुं ततो जातु न यातुधानः ॥
मन्त्रैः पुरं भीमपुरोहितस्य
तद्बद्धरक्षं विशति क्व रक्षः ।
तत्रोद्यमं दिक्पतिराततान
यातुं ततो जातु न यातुधानः ॥
तद्बद्धरक्षं विशति क्व रक्षः ।
तत्रोद्यमं दिक्पतिराततान
यातुं ततो जातु न यातुधानः ॥
अन्वयः
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भीम-पुरोहितस्य मन्त्रैः बद्ध-रक्षम् तत् पुरम् रक्षः क्व विशति? ततः दिक्पतिः (निरृतिः) तत्र यातुम् उद्यमम् आततान, जातु यातुधानः न (आततान)।
Summary
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How could a Rakshasa enter that city, its protection secured by the mantras of Bhima's priest? Therefore, the lord of that direction, Nirriti, made an effort to go, but no other Rakshasa ever did.
पदच्छेदः
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| मन्त्रैः | मन्त्र (३.३) | by the mantras |
| पुरम् | पुर (२.१) | the city |
| भीम-पुरोहितस्य | भीम–पुरोहित (६.१) | of Bhima's priest |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| बद्ध-रक्षम् | बद्ध (√बन्ध्+क्त)–रक्ष (२.१) | whose protection was secured |
| विशति | विशति (√विश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | enters |
| क्व | क्व | where |
| रक्षः | रक्षस् (१.१) | a Rakshasa |
| तत्र | तत्र | there |
| उद्यमम् | उद्यम (२.१) | effort |
| दिक्पतिः | दिक्पति (१.१) | the lord of the direction (Nirriti) |
| आततान | आततान (आ√तन् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| यातुम् | यातुम् (√या+तुमुन्) | to go |
| ततः | ततस् | Therefore |
| जातु | जातु | ever |
| न | न | not |
| यातुधानः | यातुधान (१.१) | a Rakshasa |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | न्त्रैः | पु | रं | भी | म | पु | रो | हि | त | स्य |
| त | द्ब | द्ध | र | क्षं | वि | श | ति | क्व | र | क्षः |
| त | त्रो | द्य | मं | दि | क्प | ति | रा | त | ता | न |
| या | तुं | त | तो | जा | तु | न | या | तु | धा | नः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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