आखण्डलो दण्डधरः कृशानुः
पाशीति नाथैः ककुभां चतुर्भिः ।
भैम्येव बद्ध्वा स्वगुणेन कृष्टैः
स्वयंवरे तत्र गतं न शेषैः ॥
आखण्डलो दण्डधरः कृशानुः
पाशीति नाथैः ककुभां चतुर्भिः ।
भैम्येव बद्ध्वा स्वगुणेन कृष्टैः
स्वयंवरे तत्र गतं न शेषैः ॥
पाशीति नाथैः ककुभां चतुर्भिः ।
भैम्येव बद्ध्वा स्वगुणेन कृष्टैः
स्वयंवरे तत्र गतं न शेषैः ॥
अन्वयः
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आखण्डलः, दण्डधरः, कृशानुः, पाशी इति चतुर्भिः ककुभाम् नाथैः, भैम्या स्व-गुणेन बद्ध्वा कृष्टैः इव, तत्र स्वयंवरे गतम्, शेषैः न (गतम्)।
Summary
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Indra, Yama, Agni, and Varuna—by these four lords of the directions was the journey to the Svayamvara undertaken, as if they were bound and dragged by Damayanti's own virtues. The remaining lords did not go.
पदच्छेदः
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| आखण्डलः | आखण्डल (१.१) | Indra |
| दण्डधरः | दण्डधर (१.१) | Yama (the staff-bearer) |
| कृशानुः | कृशानु (१.१) | Agni (fire) |
| पाशी | पाशिन् (१.१) | Varuna (the noose-holder) |
| इति | इति | thus |
| नाथैः | नाथ (३.३) | by the lords |
| ककुभाम् | ककुभ् (६.३) | of the directions |
| चतुर्भिः | चतुर् (३.३) | four |
| भैम्या | भैमी (३.१) | by Bhaimi |
| इव | इव | as if |
| बद्ध्वा | बद्ध्वा (√बन्ध्+क्त्वा) | having been bound |
| स्व-गुणेन | स्व–गुण (३.१) | by her own virtues (or rope) |
| कृष्टैः | कृष्ट (√कृष्+क्त, ३.३) | dragged |
| स्वयंवरे | स्वयंवर (७.१) | to the Svayamvara |
| तत्र | तत्र | there |
| गतम् | गत (√गम्+क्त, १.१) | the going was done |
| न | न | not |
| शेषैः | शेष (३.३) | by the remaining ones |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | ख | ण्ड | लो | द | ण्ड | ध | रः | कृ | शा | नुः |
| पा | शी | ति | ना | थैः | क | कु | भां | च | तु | र्भिः |
| भै | म्ये | व | ब | द्ध्वा | स्व | गु | णे | न | कृ | ष्टैः |
| स्व | यं | व | रे | त | त्र | ग | तं | न | शे | षैः |
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